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सफलता के आग्रह से जन्मी आलोचना

परदे के पीछे. फिल्म की सफलता या असफलता पहले केवल फिल्म से जुड़े लोगों का अपना मामला था परंतु मीडिया द्वारा सांस्कृतिक शून्य के दौर में फिल्म को दिए गए महत्व के कारण अब अनेक गैरफिल्मी लोग भी हिट या फ्लॉप की फिक्र करने लगे हैं।

इस फिल्ममय भारत में फिल्म से सर्वथा असंबंधित लोगों का भी सफलता के प्रति आग्रह इतना प्रबल हो गया है कि उन्हें सफलता के गुर के बारे में बात करने में संकोच नहीं रहा।

दरअसल जीवन के हर क्षेत्र में सफलता के प्रति आग्रह इतना बढ़ गया है कि उनकी सोच ही कुंठित हो गई है। महान राष्ट्रीय फिल्म ‘ए वेडनेसडे’ के बारे में फरमाया गया है कि नायक नसीर को अपने साथ चार युवा लोग लेने थे ताकि यह फिल्म दूसरी ‘रंग दे बसंती’ बन जाए।

फिल्मकार का उद्देश्य अपने विश्वास की फिल्म बनाना था और किसी की ‘दूसरी’ नहीं बनना था। सफलता से वशीभूत स्वयंभू टीकाकार ने नायक नसीर के इस संवाद को अनसुना कर दिया कि आतंकवादी ताकतों को यह समझना चाहिए कि एक आम भारतीय अपनी प्रतिभा और मेहनत से मात्र कुछ ही दिनों में चार आतंकवादियों को ढेर कर सकता है। इसमें यह बात भी अंतर्निहित है कि अगर एक ऐसा है तो सबके जागने पर आतंकवादियों का क्या हश्र होगा।

यह फिल्म आम भारतीय के उत्तरदायित्व और ताकत को रेखांकित करती है तथा कमजोर व्यवस्था के बिखरेपन को सामने लाती है। संभवत: आर.के.लक्ष्मण के आम आदमी को केंद्र में रखकर बनाए गए काटरून ने इस फिल्म की प्रेरणा दी है।

आमतौर पर मसाला फिल्में चोरी की तरह गढ़ी जाती हैं कि दर्शक की आत्मा सो जाए, यह फिल्म उसे झंझोड़कर जगाने का प्रयास है। साथ में चार युवा नायक लेने का मतलब है सोलो सांग को अनावश्यक ही कोरस में बदलना।

यह सारी सोच फिल्म को तार्किकता प्रदान करने के लिए नहीं वरन बॉक्स ऑफिस सफलता के लिए उपजी है। दरअसल सफलता के प्रति यह घोर आग्रह ही उसे नुकसान पहुंचा रहा है।

पाकिस्तान की फिल्म ‘खुदा के लिए,’ भारत की ‘आमिर,’ ‘मुंबई मेरी जान’ और ‘ए वेडनेसडे’ आतंकवाद से जन्मे मानवीय मुद्दों की फिल्में हैं, जिनका कोई प्रभाव आतंकवादियों पर नहीं पड़ता, क्योंकि उन्हें धर्माधता की अफीम इतने लंबे समय तक पिलाई गई है कि वे बदल नहीं सकते।

परंतु सख्त अफसोस कि अच्छाई की ताकतों और आम आदमी पर भी इनका सकारात्मक प्रभाव सक्रिय नजर नहीं आता। अत: चिकने मटके की तरह अपनी सपाटता में आतंकवादी और आम आदमी समान है। एक धर्माधता का शिकार है तो दूसरा धर्म के कारण अवतार के इंतजार में निष्क्रिय है।





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