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रूठते-रूठते बची किस्मत

चुनावी समर में केवल दिग्गजों में ही कांटे का मुकाबला नहीं होता, बल्कि उन नेताओं में भी रोचक मुकाबला होता है जिन पर लोगों की नजरें नहीं होतीं। ऐसी सीटों पर जीत-हार का अंतर ऐसा होता है कि हारने वाला भी जीत का स्वाद चखते-चखते रह जाता है। ऐसे रोचक मुकाबलों ने पिछले चुनाव में आधा दर्जन सीटों को प्रभावित किया।

चुनाव में जीत -

हार के अंदाज नतीजे निकलने तक लगाए जाते रहे हैं और ज्यादातर मामलों में मतगणना के अंतिम चरणों तक यह लगभग साफ हो जाता है कि कौन पार लगा और कौन चूक गया।

लेकिन छत्तीसगढ़ में 2003 के विधानसभा चुनाव में मतगणना के दौरान कुछ रोचक नजारे देखने को मिले। आधा दर्जन से ज्यादा प्रत्याशियों की किस्मत रूठते - रूठते बची तो इतने ही प्रत्याशी जीतते - जीतते हार गए। हार - जीत का अंतर 40 से 380 वोटों तक का रहा।

साय के हिस्से में आई हार

पत्थलगांव से पांच बार विधायक रहे कांग्रेस के रामपुकार सिंह को घेरने के लिए भाजपा ने अपने दिग्गज सांसद विष्णुदेव साय को मैदान में उतारा। कड़ा मुकाबला हुआ।

मतगणना के दौरान भाजपा खेमे में खुशी की लहर थी और साय का जीतना तय माना जा रहा था, लेकिन अंतिम दौर में श्री साय के हिस्से हार आई। रामपुकार छंठवी बार विधायक बन गए। वे 317 वोटों से जीते।

और भोजवानी हार गए

राजनांदगांव शहर विधानसभा क्षेत्र में भी ऐसा ही हुआ। भाजपा के लीलाराम भोजवानी अंतिम चरण की मतगणना में भी कुछ देर तक आगे थे। वोटों का अंतर ज्यादा नहीं था, फिर भी श्री भोजवानी को फूल मालाएं पहनाना शुरु हो चुका था।

मतगणना स्थल पर पटाखे छूट रहे थे। गिनती पूरी हुई और जीत का जश्न मनने लगा, तभी कांग्रेस प्रत्याशी उदय मुदलियार ने रिकाउंटिंग के लिए आवेदन दिया। वे 40 वोटों से जीत गए। देखते ही देखते नजारा बदल गया। कांग्रेस का विजय जुलूस निकल पड़ा और अवाक भाजपाइयों के पास हंगामा करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।

अंतिम दौर में पलटा पासा

अभनपुर विधानसभा सीट का मुकाबला भी बेहद रोचक था। यहां भाजपा के चंद्रशेखर साहू और कांग्रेस के धनेन्द्र साहू के बीच कांटे की टक्कर थी। कभी भाजपा आगे तो कभी कांग्रेस। यहां भी अंतिम दौर में पासा पलट गया। चंद्रशेखर साहू को 227 वोटों से पराजय का सामना करना पड़ा। धनेन्द्र साहू की किस्मत रूठते - रूठते बची।

309 वोटों से जीते वाजपेयी

बलौदाबाजार से कांग्रेस के गणोशशंकर बाजपेयी के खिलाफ भाजपा ने नए चेहरे विपिनबिहारी वर्मा को मैदान में उतारा था। आखिरकार 309 वोटों से श्री बाजपेयी विजयी हुए। लुंड्रा में भाजपा के विजयनाथ सिर्फ 42 वोट और सीपत से बद्रीधर दीवान 299 वोट अधिक पाकर विधायक बन गए। खुज्जी से भाजपा के रजिन्दरपाल सिंह भाटिया की जीत का अंतर 113 वोटों का ही रहा।

इनकी किस्मत मेहरबान

2003 के विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसे भी प्रत्याशी रहे जिनकी किस्मत मेहरबान रही। मरवाही में कांग्रेस प्रत्याशी अजीत जोगी ने भाजपा के तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष नंदकुमार साय को 54,150 वोटों से शिकस्त देकर सबको चौंका दिया। वे सबसे अधिक वोटों से जीतने वाले विधायक बन गए।

भाजपा की ओर से राजेश मूणत ने कांग्रेस के हैवीवेट लीडर तरूण चटर्जी को उनके ही गढ़ रायपुर ग्रामीण विधानसभा सीट में 38 हजार से अधिक वोटों से परास्त कर दिया।

श्री मूणत का यह पहला चुनाव था। अधिक वोटों से जीतने वालों की सूची में कांग्रेस के नंदकुमार पटेल तीसरे नंबर पर रहे। उन्होंने खरसिया से भाजपा के लक्ष्मी पटेल को 32,768 वोटों से पराजित किया। वे यहां से चार बार विधायक रह चुके हैं।

बागियों ने रुलाया

गणोशशंकर बाजपेयी ऐसे विधायक हैं जो बलौदाबाजार सीट से ही लगातार दो बार से 400 से कम वोटों से जीत रहे हैं। इसके लिए वे बागियों को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। श्री बाजपेयी के मुताबिक टिकट न मिलने से नाराज कुछ लोग निर्दलीय के रूप में मैदान में उतर आए जिससे पार्टी के वोट बंट गए। इसी सीट पर पराजित भाजपा के विपिन बिहारी वर्मा अपनी हार का कारण बागी प्रत्याशी को मानते हैं। यहां भाजपा के पुरूषोत्तम साहू ने बागी होकर एनसीपी से चुनाव लड़ा और 21 हजार से ज्यादा वोट पा गए।

इसी तरह कांग्रेस बागी परमेश्वर यदु ने 22 हजार से ज्यादा वोट पाए। राजनांदगांव में भी लगभग यही स्थिति रही। यहां कांग्रेस के बागी अशोक चौधरी ने एनसीपी के टिकट पर चुनाव लड़ा और करीब 17 हजार वोट हासिल कर लिए। यहां कांग्रेस के उदय मुदलियार बड़ी मुश्किल से जीते। कई सीटों पर बागियों ने ही कांग्रेस को हरा दिया।

ऐसा भी हुआ

मालखरौदा विधानसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी लालसाय खुंटे ने कड़े मुकाबले में निर्मल सिन्हा को 896 वोटों से पराजित किया। वे तीन साल विधायक रह पाए। निर्वाचन आयोग से आपराधिक मामले छिपाने के मामले में श्री खुंटे को विधायकी गंवानी पड़ी। उपचुनाव में भाजपा के निर्मल सिन्हा विधायक चुन लिए गए।निर्वाचन अधिकारियों पर ठीकरा

कम वोटों से हारने वाले ज्यादातर प्रत्याशियों ने अपनी हार के लिए जिला निर्वाचन अधिकारियों को ही जिम्मेदार ठहराया। कुछ तो दूसरे दिन तक रिकाउंटिंग के लिए कोशिशें करते रहे। ये कोशिशें तो सफल नहीं हो सकीं पर चुनाव के बाद इन लोगों ने उन अफसरों को हटवाकर ही दम लिया। रायपुर के जिला निर्वाचन अधिकारी सीके खेतान के खिलाफ चंद्रशेखर साहू ने मुहिम छेड़ी जिसमें कई भाजपाइयों ने साथ दिया। चुनाव के बाद श्री खेतान का तबादला मंत्रालय में हो गया। इसी तरह लीलाराम भोजवानी व राजनांदगांव के प्रभावशाली भाजपा नेताओं की शिकायत पर वहां के जिला निर्वाचन अधिकारी दिनेश श्रीवास्तव का कांकेर तबादला कर दिया गया।





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