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राजनीतिक गोधरा की बिसात

संपादकीयगोधरा कांड और उसके बाद हुए गुजरात दंगों की जांच कर रहे दो सदस्यीय जस्टिस जीटी नानावटी आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट का पहला हिस्सा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को सौंप दिया है।

रिपोर्ट मिलते ही गुजरात विधान सभा में इसे पेश करने में जैसी तत्परता नरेन्द्र मोदी ने दिखाई, उसके बाद कांग्रेस और भाजपा के आला नेताओं के बीच तू-तू मैं-मैं होना तय था, क्योंकि नानावटी आयोग से पहले वर्ष 2004 में केंद्र की वर्तमान संप्रग सरकार ने सेवानिवृत्त जस्टिस यूसी बैनर्जी के नेतृत्व में एक समिति बनाई थी और इस समिति ने गोधरा कांड को साजिश नहीं, एक हादसा बताया था।

दोनों समितियों की रिपोर्ट इस मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा के विचारों की तरह ही एक-दूसरे के ठीक विपरीत है।

दोनों आयोगों की रिपोर्टो पर राजनीति का ये आलम है कि नानावटी आयोग के टुकड़ों में रिपोर्ट पेश करने के मुद्दे को लेकर कई गैर सरकारी संगठनों ने गुजरात उच्च न्यायालय से गुहार लगाई, मगर गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा कि जांच आयोग के अधिनियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिससे किसी भी आयोग को कई हिस्सों में अपनी रिपोर्ट सौंपने को लेकर रोक लगाई जा सके।

जाहिर है इसके बाद भाजपा के मनोबल में और वृद्धि हुई और वह अपनी राजनीतिक धारा के अनुरूप इसकी व्याख्या कर रही है और कांग्रेस अपनी राजनीतिक धारा के अनुरूप इस पर अपना विरोध प्रकट कर रही है।

कई राज्यों में होने जा रहे चुनाव को ध्यान में रखकर राजनीति के खिलाड़ियों ने अपने-अपने पक्ष में वोट बैंक सुरक्षित करने के लिए गोधरा की बिसात बिछा दी है। भाजपा ने जहां इस रिपोर्ट को बिल्कुल सच बताया है, वहीं कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक लाभ’ लेने की कोशिश।

नानावटी आयोग ने अभी अपनी पूरी रिपोर्ट नहीं सौंपी है, लेकिन आगामी प्रांतीय चुनावों का ऐसा दबाव है कि राजनीतिक दलों की पैंतरेबाजियों के बीच पूरी रिपोर्ट के आने तक का धैर्य नहीं है।

हमारी राजनीति किस कदर वोट बैंक की प्रदक्षिणा में ही अधिकांश समय जुटी रहती है यह इससे भी साबित हो जाता है कि सच क्या है और झूठ क्या है इस पर अभी से सियासी काजियों ने फैसला देना शुरू कर दिया है। वोट बैंक को सुरक्षित करके राजनीतिक महत्वाकांक्षा की तुष्टि की हड़बड़ी का आलम यह है कि अभी से भावी मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तय हो रहे हैं।

येन केन प्रकारेण कुर्सी हासिल करना ही जब राजनीति का वास्तविक उद्देश्य बन जाता है, तब देशहित और जनहित बहुत पीछे छूट जाता है। आज तक शिक्षा को मौलिक अधिकार नहीं बनाया जा सका, आतंकवाद को लेकर ठोस नीतिगत फैसला नहीं लिया जा रहा है। राजनीतिक शतरंज के खिलाड़ी देश का चाहे जो करें, उनकी कुर्सी का कुछ न हो।





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