लघु कहानियों के दो संस्करणों और एक नॉवल के साथ जुम्पा लाहिड़ी ने साहित्यिक दुनिया में अपनी एक खास जगह बना ली है। उनका शुमार अब अमिताभ घोष, विक्रम सेठ और सलमान रु शदी जैसे ख्यात लेखकों में होने लगा है।
बहुत कम समय में उन्होंने जो उपलब्धियां हासिल की हैं उनमें पुलित्जर अवार्ड, ओ हैनरी और हैमिंग्वे अवार्ड तथा गुगेनहेम फैलोशिप प्रमुख हैं। भारतीयों के बारे में ज्यादा लिखने वाली जुम्पा अमेरिका में रह रही हैं और एक गोरे अमेरिकी से विवाहित हैं। मेरा अनुमान है कि दो बच्चों की मां जुम्पा ३क् वर्ष के आसपास होंगी। लेखन के क्षेत्र में उनकी शानदार शुरुआत से तय है कि वह काफी नाम कमाएंगी।
अन्य लेखक जहां विभिन्न विषयों पर लिखते हैं, जुम्पा मुख्यत: विदेशों में रह रहे बंगालियों के रहन-सहन और पहचान पर केन्द्रित रहती हैं। विदेशों में रह रहे बंगाली एक-दूसरे के निरंतर संपर्क में रहते हैं।
अन्य भारतीयों, जैसे सिंधी, सिख, गुजराती और मलयाली आदि ने भी एक-दूसरे के संपर्क में रहने के लिए संस्थाओं का निर्माण कर रखा है। ये लोग अक्सर मंदिरों, मस्जिदों तथा गुरुद्वारों आदि में मिलते हैं। बंगालियों के लिए अपने धर्म से ज्यादा महत्व बंगाल की पहचान का है।
हालांकि भाषा सभी बंगालियों को एक सूत्र में पिरोए रखने में मददगार है, लेकिन ऐसा बंगलादेशियों के मामले में नहीं है जो कि ज्यादातर मुस्लिम हैं। खाने के मामले में भी बंगाली दूसरों से अलग हैं।
जब भी एक-दूसरे से मिलते हैं, बढ़िया चावल, मछली और बंगाली विधि से तैयार लजीज खाने का खास ख्याल रखते हैं। विदेशों में रह रहे बंगालियों की पृष्ठभूमि भारत के अन्य भागों से विदेशों में गए लोगों से भिन्न है। ज्यादातर बंगाली ऐसे उच्च या मध्यम वर्ग से संबंधित हैं, जहां उच्च शिक्षा और किताबें पढ़ने का काफी महत्व है।
अमेरिका में रह रहे बंगाली चाहते हैं कि उनके बच्चे आइवी लीग, विश्वविद्यालय जैसे हार्वर्ड, प्रिंस्टन, कोलंबिया और स्वार्थमोर आदि में प्रवेश पाएं। विदेशों में भी यह अपनी पहचान भद्रलोक के रूप में कायम रखते हैं। सिर्फ पैसा कमाने के लिए बंगाली विदेश का रुख नहीं करते। इनका जोर चिकित्सा, इंजीनियरिंग और शिक्षण आदि में श्रेष्ठता हासिल करने पर रहता है। विदेश जाकर ये लोग चाहे कितने भी अमेरिकी, यूरोपीय हो जाएं, जब बात शादी की आती है तब अपनी ही पृष्ठभूमि के लड़के या लड़की को ही तरजीह देते हैं।
अपने बहुचर्चित नॉवल ‘द नेमसेक’ (जिस पर मीरा नायर ने फिल्म भी बनाई है) के जरिए जुम्पा ने बंगाली संस्कृति को आगे बढ़ाया है। ऐसा ही उन्होंने लघु कहानियों के पहले संग्रह ‘द इंटरप्रिटर आफ मैलॉडिज’ में भी किया था।
‘अनअकाउंटेबल अर्थ’ (रैंडम हाउस) में भी उन्होंने इसी विषय पर लिखा है। इस संग्रह की मुख्य कहानी पत्नी के देहांत के बाद अकेले रह गए एक 70 वर्षीय पिता, उसकी विवाहित बेटी, उसके पति और बच्चों के इर्द-गिर्द घूमती है।
कहानी के मुख्य पात्र एक बंगाली व्यक्ति का यूरोप का दौरा करने के दौरान एक ६क् वर्षीय विधवा से संबंध कायम हो जाता है। रहस्य का पर्दाफाश तब होता है जब उसकी बेटी के हाथ वह पत्र लग जाता है जो वह प्रेमिका को लिखकर मेल करना भूल जाता है।
इसी कहानी से जुम्पा द्वारा अब तक लिखित कहानियों और नॉवल का परिचय मिल जाता है। यह कहानी मेरे द्वारा अब तक पढ़ी गई बेहतरीन कहानियों में से एक है।
साथ क्या ले जाएंगे?
वीरेंद्र त्रेहन की संस्था ‘एमिटी एंड नेशनल सॉलीडैरिटी’ ने मुझे सम्मानित किया है। संसद के उपभवन में आयोजित एक प्रभावशाली कार्यक्रम में लोकसभा के अध्यक्ष, सोमनाथ चटर्जी, सोली सोराबजी समेत कई गण्यमान्य लोगों ने शिरकत की।
सोली सोराबजी ने मेरा प्रशंसात्मक उल्लेख किया और शिंदे, वसंत साठे तथा कई अन्य ने भी अपने भाषण में मेरी तारीफ की। मैं यह नहीं कहूंगा कि अपनी तारीफ सुनकर मुझे अटपटा लगा। मुझे खुशी हुई लेकिन इस अवार्ड के साथ मिलने वाली राशि के कारण मैं पसोपेश में पड़ गया हूं। मैं तय नहीं कर पा रहा कि इसे खर्च कैसे करूं। लजीज खाना और बढ़िया शराब मेरी पसंद रही है, लेकिन अब हाजमा कमजोर होने के कारण ज्यादा नहीं खा पाता।
पीना भी खाने से पहले एक अदद जाम तक सीमित हो गया है। कितना भी खर्च कर लूं, फिर भी अपनी पूरी राशि खर्च नहीं कर पाऊंगा। उम्र ९४ साल हो गई है और मुझे पता है कि अब जिंदगी के मजे लूटने के लिए ज्यादा वक्त नहीं है। यह भी सही है कि मरने के बाद सारे पैसे अपने साथ नहीं ले जा पाऊंगा। ऐसे में करूं क्या? मेरे पास तीन विकल्प हैं। पहले के दो विकल्प धर्म से जुड़े हैं और तीसरा पूरी तरह व्यक्तिगत है।
पहला विकल्प जूडाइज्म, क्रिश्चियानिटी और इस्लाम का है। यह तीनों धर्म आश्वस्त करते हैं कि अच्छे व्यक्तियों को स्वर्ग मिलेगा। त्रेहन की फाउंडेशन द्वारा दिए गए अवार्ड से साबित होता है कि मैं बुरा आदमी नहीं हूं। इस लिहाज से स्वर्ग में मेरा प्रवेश होना चाहिए। वहां झरनों में मदिरा मिल सकती है। आवश्यकता पड़ने पर कन्याएं भी सुलभ होंगी। ऐसे में पैसे खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
दूसरा विकल्प आर्यन है। जैन, बुद्ध, हिंदू और सिख धर्म के अनुयायी आश्वस्त करते हैं कि मरने के बाद पुनर्जन्म होगा। देखने में भले ही मैं इस जन्म जैसा न दिखूं पर जोश इस जन्म जैसा ही होगा। ऐसे में सवाल यह है कि क्या इस जन्म वाला बैंक अकाउंट अगले जन्म में भी मेरे साथ देगा? इसमें मुझे संदेह है। अगले जन्म में जब मैं अपना चैक कैश करवाने के लिए बैंक जाऊंगा तो मुझसे मेरी पहचान पूछी जाएगी।
यह जवाब देने पर कि पुनर्जन्म के कारण मेरी पहचान बदल गई है, लेकिन जोश पहले वाला ही है, शायद ही कोई मेरी बात सुने। चैक कैश करने के स्थान पर बैंककर्मी मुझे ठग करार देकर पुलिस को सौंप देंगे।
पहले के दो विकल्प न मानने पर तीसरे विकल्प के बारे में धार्मिक संस्थाओं की राय अच्छी नहीं है। मैं नहीं जानता कि मरने के बाद आदमी कहां जाता है? अत: मरने से पहले जो भी खर्च कर पाया, कर दूंगा और शेष राशि बच्चों के लिए छोड़ जाऊंगा। अब यह वही जानें कि इसका क्या करना है। अपने पास रखनी है, मेरी सेवा करने वालों को देनी है या दान करनी है। इस उम्र में यह सोचने के लिए मजबूर करने पर कि आप अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सकते, त्रेहन का शुक्रिया।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)