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जन्म शताब्दी तो ठीक पर कई जवाब अभी बाकी

भास्कर विशेष: शहीद भगत सिंह की जन्मशती मनाते हुए एक साल पूरा हो गया है। इसे लेकर देशवासियों में गज़ब का जोश है लेकिन कुछ सवाल हैं जो अनुत्तरित हैं। क्या हम भगत सिंह तथा अन्य शहीदों के सपनों के भारत का निर्माण कर पाए हैं? ऐसा क्यों है कि अधिकांश भारतीय आज भी भरपेट भोजन नहीं कर पा रहे हैं!

अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट देश के विकास की वास्तविक तस्वीर पेश करती है। उन्होंने साफ कहा है कि भारत के ८क् करोड़ लोगों की दैनिक आय आज भी २क् रुपए से कम है। ऐसी हालत तक है जब अंग्रेजों को भारत छोड़े छह दशक गुजर चुके हैं।

भगत सिंह ने भारत नौजवान सभा के मैनिफेस्टो में साफ लिखा था कि हम उस स्वराज के लिए काम कर रहे हैं जो नब्बे फीसदी लोगों के लिए होगा। उनका मानना था कि अंग्रेजों के शासनकाल में भी दस फीसदी भारतीय ऐसे थे जिन्हें कोई परेशानी नहीं थी। इन लोगों को उस समय की तमाम सुविधाएं हासिल थीं।

मतलब यह कि आजादी के छह दशक बाद फर्क सिर्फ दस फीसदी का ही आया है। अगर आजादी से पहले दस फीसदी लोग खुश थे तो आज ज्यादा से ज्यादा बीस फीसदी हैं।

ध्यान देने लायक बात यह है कि भगत सिंह के सरोकारों वाले भारत के निर्माण में हम सभी ने अपने-अपने स्तर पर क्या किया है? तीन मार्च 1931 को अपने छोटे भाई कुलतार सिंह के नाम लिखे पत्र में उन्होंने शे’र लिख कर संदेश दिया था-

मेरी हवा में रहेगी, ख्याल की बिजली

ये मुश्ते खाक है फानी, रहे रहे, न रहे

भगत सिंह के लिए उनके असूल ही जीवन का आधार थे। जब जिंदगी बचाने और असूल पर चलने का वक्त आया तो भगत सिंह ने अपने पिता को अक्तूबर 1930 में लिखा था कि मुझे असूल प्यारा है, जिंदगी नहीं। आज जबकि अंधी दौड़ जायदाद बनाने की है, भगत सिंह की सोच की प्रासंगिकता पहले से कहीं ज्यादा है। देखने में आया है कि आज के भारत में भगत सिंह को जानने तथा समझने का प्रयास कम और उनके नाम पर अपने विचारों का प्रचार ज्यादा होने लगा है।

निराशा से घिरे युवाओं को उत्साहित करने के लिए भगत सिंह ने लिखा था-

कमाले बुज़दिली है अपनी ही आंखों में पस्त होना, गर ज़रा सी जुर्रत हो तो क्या कुछ हो नहीं सकता।

उभरने ही नहीं देती यह बेमाइगियां दिल की, नहीं तो कौन सा कतरा है, जो दरिया हो नहीं सकता।

एक और जगह उन्होंने कहा था, ‘महान लोग महान हैं क्योंकि हम घुटनों के बल चल रहे हैं। आओ खड़े हो जाएं।’ भगत सिंह का कहना था कि हमारी लड़ाई दोधारी है। उन कमजोरियों के खिलाफ भी हमें लड़ना पड़ रहा है जिसका फायदा हमारे अपने खुदगर्ज लोग उठाते हैं।

अंग्रेजों के साथ-साथ हमें ऐसे स्वार्थी लोगों से भी जूझना है। जनता का दुश्मन कोई व्यक्ति नहीं, वह नीतियां होती हैं जो लोगों से उनकी मेहनत और कुदरती स्रोत छीनने के लिए बनाई जाती हैं। उन्होंने 1928 में यह भी कहा था कि भारत की दुर्दशा के हिस्सेदार वे लोग हैं जिन्हें भगवान की चिंता है पर भगवान के बनाए लोगों की नहीं।

उन्होंने कहा था, इंसान के जीवन पर जो भी चीज असर करती है वह मेरी चिंता और चिंतन का कारण है। और यह भी कि ‘जब से मुझे वैज्ञानिक विचारधारा में यकीन हुआ है, मैं वैज्ञानिक विचारों से जीवन जी रहा हूं। मैं यथार्थवादी हूं। मैं अपनी अंत प्रकृति पर विवेक की सहायता से विजय चाहता हूं।

..प्रयत्न तथा प्रयास करना मनुष्य का कर्तव्य है, सफलता तो संयोग तथा वातावरण पर निर्भर है।’ इसलिए भगत सिंह के विचारों को पढ़ना और सुनना ही नहीं, उन्हें जीवन प्रवाह का हिस्सा बनाना ही सही मायनों में शहीदों को याद करना हो सकता है।

जन्म शताब्दी मना रही नई पीढ़ी याद रखे भगत सिंह के अंतिम शब्द, ‘मैं जिस ऊंचाई पर पहुंचा हूं, वह साथियों की कुर्बानी और उनके साथ उसूलों पर चलने की वजह से हूं।’ भगत सिंह एक व्यक्ति नहीं, वह उन उत्साही नौजवान साथियों के छोटे से समूह का नाम है जिन्होंने अंग्रेजों से आंख में आंख मिलाकर टक्कर ली।

शहीद भगत सिंह की जन्म शताब्दी के संदर्भ में आज जरूरत शहीदे आजम की विचारधारा को ठीक से समझने और उस पर ईमानदारी से अमल करने की है।

-लेखक शहीदे आजम भगत सिंह के भांजे हैं।





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VS
Sunday, 28th Sep 2008, 13:57
Wish we had more people like Sahid Bhagat Sing