News
Metros
Chandigarh Chandigarh शिमलारिज मैदान पर अरसे से खामोश खड़ा कनोर का पेड़ आज उदास है। उसे 70 के दशक के समर फेस्टिवल की वो रात जरूर याद आ रही होगी, जब सुर साधक महेंद्र कपूर के गीतों पर शिमला वासियों के साथ प्रकृति भी झूम रही थी। ये वही महेंद्र कपूर थे जिनके कंठ से फूटकर हिमाचल का लोकराग ‘लागा ढोलो रा ढमाका मेरा हिमाचलो बड़ा बांका’ मधुर हो गया था।
आकाशवाणी में पहाड़ी गानों की रिकॉर्डिंग : उस दौर में आकाशवाणी शिमला के लिए नामी गायकों की रिकॉर्डिग में शामिल एस. शशि ने दिल्ली से ‘भास्कर’ को बताया कि सत्तर के दशक में महेंद्र कपूर की आवाज में ‘लागा ढोलो रा ढमाका’ की रिकॉर्डिग की गई।
‘धारा रे गुजरो’ की रिकॉर्डिग उसी दौरान हुई। महेंद्र कपूर हिमाचल के इन लोकप्रिय गीतों को स्वर देने के लिए उत्सुक थे। रिकॉर्डिग के दौरान आकाशवाणी शिमला में उत्सवी माहौल था। हर कोई महेंद्र कपूर से मिलने को बेताब था। रंगकर्मी श्रीनिवास जोशी बताते हैं कि महेंद्र कपूर को आकाशवाणी शिमला ने 200 रुपए पारिश्रमिक देना तय किया था। लेकिन उन्होंने पारिश्रमिक लेने से मना कर दिया था।
1989 में आखिरी बार आए शिमला :
महेंद्र कपूर अंतिम बार 1989 में समर फेस्टिवल में भाग लेने आए थे। वरिष्ठ गीतकार सत्येन शर्मा बताते हैं कि महेंद्र कपूर सादा दिल इंसान थे। शिमला आकर खुश होते थे। रवि के संगीत निर्देशन में गाए उनके गाने बड़े मकबूल हुए। सत्येन शर्मा उस समय पब्लिक रिलेशन डिपार्टमेंट में थे। उन्होंने कहा, महेंद्र कपूर के कंठ में देशभक्ति के गीत तो सजते ही थे, उनके गाए गीतों में जीवन का उल्लास भी है।
साहिर के गीत और उनका स्वर:
साहिर के गीत और महेंद्र कपूर की मधुर आवाज का संगम अविस्मरणीय रहेगा। सत्येन शर्मा उनका एक गीत याद करते हैं, ‘मौसम है बहारों का फूलों को खिलना है, चल जल्दी से चल गड्डिए मुझे यार से मिलना है।’ शायद महेंद्र कपूर को यार (परमात्मा) से मिलने की जल्दी थी, तभी वे अचानक चले गए।