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शारदीय ‘नवरात्र’ देवी पूजा के लिए प्रसिद्ध है। ये धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चारों पुरुषार्थो को देने वाली है। आज के भौतिकवादी युग में देवी उपासना एवं पूजा के स्वरूप में परिवर्तन हो गया है। शॉर्टकट के इस युग में पूजा की विधि भी संक्षिप्त होनी जरूरी है।
देवी पूजा के प्रमुख मानकों में घट स्थापना, जवारे रोपण, अखंड दीप साधना, देवी की मूर्ति अथवा चित्र का पंचोपचार पूजन, अष्टमी-नवमी को कुलदेवी पूजन, कुमारी पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ, नवार्ण मंत्र जप साधना एवं देवी स्तोत्र का पाठ आदि प्रमुख हैं। पूजा विधि प्रारंभ करने से पूर्व जल से शरीर की शुद्धि कर लें, पूजा सामग्री को एक तश्तरी में एकत्रित कर अपने सम्मुख रख लें।
एक चौकी या पाट पर देवी की तस्वीर, मूर्ति अथवा जो भी साधन उपलब्ध हो, विराजमान कर दें।
१. घटस्थापना - प्रतिपदा को शुभ मुहूर्त में पवित्रतापूर्वक देवी के सम्मुख पाट पर घट (कलश) की स्थापना करें। एक तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें आम के पांच हरे पत्ते लगा दें। उस पर श्रीफल रखें। इस चौकी पर धान्य (गेहूं) रखकर इसकी गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य से पूजा करें। इसे घटस्थापना कहते हैं। घट को लक्ष्य कहा जाता है। यह पवित्रता एवं समृद्धि का सूचक है।
२. जवारे रोपण- देवी भक्त प्रतिपदा के दिन परिवार की खुशहाली के लिए जवारों का भी रोपण करते हैं। मिट्टी के एक बड़े दीपक में काली मिट्टी डालकर धान्यों के राजा जौ या गेहूं को बिखेर दें। जल छिड़ककर इनकी पंचोपचार से पूजा करें। जवारे मांगलिक होते हैं और हरियाली व समृद्धि के सूचक माने जाते हैं।
3. अखंड दीप साधना- दीप देवी के स्थान पर शुद्ध घी अथवा तेल के एक बड़े दीपक में कपास की बड़ी बत्ती बनाकर उसे सुरक्षित स्थान पर रख दें। दीप ऐश्वर्य, सुख, समृद्धि का प्रतीक हैं।
4. देवी पूजा- देवी की मूर्ति अथवा चित्र को शुद्ध जल से स्नान कराकर चौकी के मध्य स्थापित करें। सर्वप्रथम अनामिका उंगली से देवी के मस्तक, हृदय, भुजाओं और चरणों में गंध लगाएं। फिर देवी को रक्त पुष्प समर्पित करें। दीपक का पूजन करें और नैवेद्य समर्पण कर पूजा विधि संपन्न करें। यह हुई पंचोपचार देवी पूजा। इस पूजा से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - चारों पुरुषार्थो की प्राप्ति होती है।
5. कुलदेवी पूजन- अपनी-अपनी कुल परंपरानुसार दुर्गाष्टमी अथवा नवमी को कुलदेवी पूजन का भी विधान होता है। यदि हम पूरे नौ दिन देवी की पूजा नहीं कर सकें तो अष्टमी या नवमी को पूरे परिवार के साथ महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती और भैरवपूजन के साथ बटुक व कुमारी पूजन कर सकते हैं।
6. कुमारी पूजन- नवरात्रि में २ से १क् वर्ष की कुमारी के पूजन का विधान होता है। यदि प्रतिपदा से नवमी तक दो वर्ष से १क् वर्ष की कन्याओं का पूजन किया जाए तो अति उत्तम है। यदि संभव न हो तो नवमी को एक साथ नव दुर्गा स्वरूप कुमारी पूजन से ऐश्वर्य, भोग, चारों पुरुषार्थो, श्री और संपदा की प्राप्ति होती है।
7. देवी स्तवन- प्रतिपदा से नवमी र्पयत दुर्गा सप्तशती का पाठ भी किया जा सकता है। यह दुर्गा पूजा का एक विशेष अंग माना जा सकता है। दुर्गासप्तशती में १३ अध्याय होते हैं, जो तीन चरित्रों में विभक्त हैं। पहले, दूसरे और तीसरे चरित्र का प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीया में पठन कर सकते हैं। अथवा नौ दिनों में भी इसका पारायण किया जा सकता है। यदि यह भी संभव न हो तो नवार्ण मंत्र ओम ऐं हृीं क्लीं चामुंडायै विच्चै - इस मंत्र का भी प्रतिदिन पाठ करने का विधान है। यह महामंत्र का जाप भी इच्छानुसार करें। इससे देवी की प्रसन्नता प्राप्त होती है।
इस प्रकार नवरात्र में उपयरुक्त साधनों में से कोई भी एक उपासना या साधना का समय अपनी सुविधानुसार और संपूर्ण अनुष्ठान के साथ करना चाहिए। ये सभी साधन सामान्य एवं सर्व सुलभ हैं और उपयोगी भी।