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सिनेमा में बच्चे और बॉक्स ऑफिस

परदे के पीछे. ऑस्कर के लिए भारत की ओर से नामांकित ‘तारे जमीं पर’ में बाल कलाकार दर्शील के अभिनय का सराहा जाना और पुरस्कृत होना फिल्म के इनाम जीतने से भी अधिक संभव लगता है, क्योंकि फिल्म के पुरस्कृत होने के लिए केवल फिल्म की गुणवत्ता नहीं वरन उसके गहन प्रचार की जरूरत होती है और चार करोड़ रुपए का खर्च मामूली माना जा सकता है।

आमिर को ‘लगान’ का अनुभव है जिससे कमतर फिल्म को राजनैतिक कारणों से पुरस्कृत किया गया था। अमेरिका अपने अंतरराष्ट्रीय गुनाह के लिए संबंधित देश की फिल्म को ऑस्कर देकर एक तरह से क्षमा याचना प्रस्तुत करता है।

अब आमिर अनुभवी खिलाड़ी की तरह ऑस्कर के अखाड़े में जोर आजमाइश करेंगे। इस बार उन्हें दूसरा अतिरिक्त लाभ यह है कि ऑस्कर के मतदाता बच्चों की समस्याओं के प्रति अत्यंत सहिष्णु हैं और बच्चों की फिल्में सराही जाती हैं।

अभिनय के स्थापित मानदंड पर दर्शील खरे उतरते हैं और उनकी स्वाभाविकता सबका मन मोह लेती है। हिंदुस्तानी सिनेमा में बच्चों को प्राय: अतिनाटकीयता के साथ प्रस्तुत किया जाता है। बेकार के रोने-धोने से बॉक्स ऑफिस पर सफलता मिल सकती है, परंतु वह अभिनय नहीं है।

राजकपूर की ‘बूट पॉलिश’ में बाल कलाकार बेबी नाज को अंतरराष्ट्रीय कांस समारोह में पुरस्कृत किया गया था। एक जमाने में आज के लोकप्रिय फिल्मकार फरहान अख्तर की मां हनी इरानी अत्यंत लोकप्रिय बाल कलाकार थीं।

भारत में पहली लोकप्रिय बाल कलाकार तबस्सुम थीं, जिन्हें आप कभी-कभी छोटे परदे पर आज भी देखते हैं। बचपन में चावटपन और अतिनाटकीयता बेबी तबस्सुम में कुछ ऐसी भरी गई कि ताउम्र वे उतनी वाचाल, चावट और नकली बनी रहीं।

दरअसल बचपन में सितारा हैसियत अर्जित करने वाले अधिकांश लोग जवान होकर अभिनय क्षेत्र में असफल और कुंठित रहे हैं। इनके मां-बाप ने भी इन्हें टकसाल ही समझा है और असफलता के दौर में बाजार से लौट आए खोटे सिक्के की ही तरह माना है।

इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारतीय सिनेमा में बच्चों को बच्चों की तरह प्रस्तुत नहीं किया जाता। ये पात्र अत्यंत अस्वाभाविक और बनावटी लगते हैं। ये खेलते चैंपियन की तरह हैं, बात करते हैं अरस्तु की तरह।

कुछ फिल्में अपवाद स्वरूप रही हैं। ‘तारे जमीं पर’ में प्रस्तुत सारे बच्चे स्वाभाविक लगते हैं और दर्शील ने तो कमाल ही किया है। विदेशी फिल्मों में भी बच्चों के पात्र अस्वाभाविक ही रहे हैं। जिन फिल्मकारों ने अपने मन में बचपन को अक्षुण्ण रखा है, उनकी फिल्मों से रागात्मक तादात्मय दर्शकों ने बनाया है।





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