आलेख. अस्सी के दशक के शुरुआती दौर में दिल्ली में ‘ट्रांजिस्टर बमों’ का बड़ा हौआ था। इन कच्चे, घर पर बने विस्फोटकों को निरापद लगने वाले ट्रांजिस्टरों में फिट कर दिया जाता और उन्हें सार्वजनिक स्थानों, बसों, बस-स्टॉप और ऐसी ही अन्य जगहों पर छोड़ दिया जाता।
ऐसे कृत्यों को खालिस्तान के लिए लड़ने वाले आततायी अंजाम देते। भले ही तब ज्यादातर आतंकवाद पंजाब तक ही सीमित था, जहां गांवों को अक्सर मशीनगन धारी अतिवादियों द्वारा निशाना बनाया जाता, लेकिन आततायी इन ट्रांजिस्टर बमों के जरिए दशहत को देश की राजधानी तक ले आए।
इसका नतीजा यह हुआ कि सिखों को हर जगह संदेह की नजर से देखा जाने लगा। आप किसी भी सिख से उन दिनों के बारे में पूछिए तो वह आपको बताएगा कि हवाई अड्डों और ऐसी ही अन्य जगहों पर खास तौर पर उन्हें कितनी सख्त जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था।
दिल्ली में जहां भी कोई सिख बस में चढ़ता, तो उसमें बैठे दूसरे लोग भयभीत नजरों से उसे देखने लगते। हालांकि कुछ खालिस्तान समर्थकों ने सरकार के खिलाफ जंग छेड़ रखी थी लेकिन इसकी वजह से एक पूरा समुदाय, जिसे तब तक देशभक्ति और साहस की मिसाल माना जाता था, अचानक संदेह के घेरे में आ गया।
पंजाब में, जहां आतंकवाद अपने चरम पर था, युवा सिखों को अक्सर उठा लिया जाता और उनमें से कइयों का तो आज तक पता नहीं है। उनके परिवार वाले पुलिस की ज्यादतियों की शिकायत करते। पुलिस यह कहते हुए अपना बचाव करती कि यह तो एक जंग है। यह उस देश के लिए तनावपूर्ण दौर था, जिसने कभी इतने व्यापक पैमाने पर आतंकवाद नहीं देखा था। आज भी कुछ उसी तरह के हालात हैं, हालांकि कुछ बातें ऐसी हैं जो उस दौर से बिलकुल जुदा हैं।
खालिस्तान समर्थक सिखों का अतिवाद ज्यादातर स्थानीय स्तर का मसला था, जो एक राज्य और इसके समीपवर्ती क्षेत्रों तक सीमित था, जबकि आज आतंकवाद धीरे-धीरे पूरे देश में फैलता जा रहा है।
खालिस्तान एक निश्चित लक्ष्य था जबकि ‘इस्लामिक’ आतंकवाद संभवत: हताशा और क्रोध की उपज है। यद्यपि तब के दौर और आज के हालात में कुछ साम्य भी है मसलन जहां-तहां होती आतंकी वारदातों के चलते उसी तरह भय के माहौल का बनना, उसी तरह एक पूरे समुदाय को संदिग्ध नजरों से देखना।
मौजूदा दौर में मुस्लिम होने का मतलब है परोक्ष रूप से शक और वैर को बुलावा देना। आज लोग किसी सार्वजनिक स्थान पर यूं ही विचरती युवा मुसलमानों की एक टोली को भी संदेह की नजर से देखते हैं। आज लोगों की यही सोच है कि वे संभवत: हाथ से निकलते जा रहे हैं और पुलिस के आरोपों में कुछ न कुछ सच्चई जरूर होगी?
यही कारण है कि दिल्ली, अहमदाबाद और बाकी जगहों पर पुलिस द्वारा किसी आतंकी इकाइयों, उनके स्लीपर सेल्स और तथाकथित मास्टरमाइंड को खत्म करने को लेकर किए गए सारे दावों पर कहीं न कहीं आसानी से भरोसा कर लिया जाता है।
कौन जानता है(या किसे परवाह है) कि कितने निर्दोष-मासूम लोगों को इस आरोप में पकड़ा जा रहा है? ऐसे मामलों में अक्सर एक राज्य की पुलिस की राय दूसरे राज्य की पुलिस से जुदा होती है, लेकिन हमारे ऊपर डर और चिंता इस कदर हावी है कि हम इस पर ध्यान ही नहीं देते।
इसके बाद मीडिया और पंडितों की भूमिका शुरू होती है। लगता है हमारे टेलीविजन चैनलों और अखबारों ने आतंकी गिरफ्तारियों से संबंधित अपने कवरेज के तहत लोगों को चेताने और सूचित करने की प्रक्रिया में सारे दिखावों को पीछे छोड़ दिया है।
उनमें कहीं भी ‘कथित तौर पर’ या ‘जैसा कि पुलिस ने बताया’ जैसे विशेष शब्द नहीं होते। हमारे धाराप्रवाह बोलने वाले एंकर्स ड्रामा रचते हुए हमें बताते हैं कि हमारा एक जांबाज सिपाही एनकाउंटर में शहीद हो गया और पुलिस ने दिल्ली धमाकों की गुत्थी सुलझा ली है।
भड़कीले रंगों से सजे ग्राफिक्स ‘घर में ही पनपे आतंक’ की घोषणा करते हैं। वैसे हमारे यहां घरेलू स्तर पर पनपा आतंकवाद पहले भी तो रहा है और क्या आपने कभी पुलिस से सुबूत मांगने के बारे में सोचा है? आतंकी केसों के संदर्भ में उनकी जांच-पड़ताल का रिकॉर्ड खास अच्छा नहीं है।
लगता है हमारा देश भूलने की बीमारी से ग्रस्त है। हमारे हालिया इतिहास के बारे में हमारा ज्ञान दुखद रूप से नगण्य है। युवाओं को कुछ भी पता नहीं है (चूंकि उस वक्त वे वहां नहीं थे) और व्यवस्था, जिसे पता है कि पंजाब में क्या हुआ, इसके क्या वीभत्स नतीजे रहे, किस तरह हमारा समाज दो-फाड़ हो गया, लेकिन इससे जुड़े लोग यह सब नहीं बताएंगे क्योंकि इससे उनका उद्देश्य सफल नहीं होता। भय का निर्माण करना राजनीतिक छल-कपट की जांची-परखी प्रक्रिया है जो आखिरकार सफल होती है।
कोई भी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने और इसे समूल नष्ट करने की जरूरत से इनकार नहीं कर सकता। और हां, इसे समझा जा सकता है कि गलतियां होंगी और गलत निर्णय भी लिए जाएंगे।
पंजाब में, पुलिस की सख्ती बरतने की नीतियों के नतीजे मिले, लेकिन जैसा कि केपीएस गिल समेत सभी पुलिस अधिकारी आपसे कहेंगे, इस मुहिम में नागरिक समाज का भरोसा जीतने के लिए व्यापक तौर पर पहल की गई और उन्हें समझाया गया कि अतिवादियों की मदद करने या उनकी पहचान छिपाने से आपको कुछ हासिल नहीं होगा।
ज्यादातर सिख खालिस्तान के खिलाफ थे। यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि ज्यादातर मुस्लिम भी आतंकवाद के सताए हुए हैं, लेकिन हम उन्हें भी उसी तराजू में तौलते हैं।
कुछ समय के लिए भावुकतापूर्ण ‘छद्म-धर्मनिरपेक्षता’ को भूल भी जाएं तो उस विधान तथा सभी आरोपों को साबित करने की अनिवार्यता के बारे में क्या जो सभी तर्क से परे है? क्या हमारे अचानक उत्तेजित होने वाला पुलिस बल इसके बारे में भूल गया है?
कहा जाता है कि इतिहास खुद को दोहराता है। पहले एक त्रासदी के रूप में और बाद में एक कॉमेडी के रूप में। हम अपनी आंखों के सामने इन दोनों का मिला-जुला रूप यानी त्रासद स्वांग बनते हुए देख रहे हैं और लगता है हम इसे रोकने में असमर्थ हैं।
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