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खेल होंगे शिक्षा का केन्द्रबिंदु

आलेख.गत सप्ताह न्यूयॉर्क में यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली के 62वें अधिवेशन के दौरान चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से सांकेतिक रूप से महत्वपूर्ण मुलाकात की।

कुछ समय पूर्व वियना में न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप (एनएसजी) की भारत के परमाणु समझौते से जुड़ी एक बैठक में भारत का परोक्ष रूप से विरोध के समाचारों के बाद दोनों देशों के बीच यह पहली उच्च स्तरीय बैठक थी। इस मुलाकात के लिए और भारत के प्रति अपनी सद्भावना दिखाने के लिए चीनी प्रधानमंत्री एक भेंट लेकर आए थे।

उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह को निशानेबाज अभिनव बिंद्रा की वह फोटो भेंट की जिसमें बीजिंग ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद अभिनव बिंद्रा विजेता की मुद्रा में थे। एक अरब से अधिक आबादी वाले इस देश के लिए इकलौता स्वर्ण पदक कितना महत्व रखता है इसे चीन के प्रधानमंत्री ने भलीभांति समझ लिया था।

वियना की कड़वाहट को दूर करने के लिए बिंद्रा का आत्मनियंत्रित, सौम्य और मुस्कराते चेहरे की तस्वीर ही इन दिनों भारत के लिए काफी है! लेकिन क्या भारत भी अभिनव बिंद्रा के चेहरे के महत्व को भलीभांति समझ रहा है? इस प्रश्न का उत्तर आने वाले समय में तब मिलेगा जब यह पता चलेगा कि खेलों को बढ़ावा देने के लिए बिंद्रा की योजनाओं को व्यवस्था द्वारा कितना समर्थन दिया जाता है।

अभिनव बिंद्रा की योजना के अनुसार उनके द्वारा देशभर में लगभग 500 अभिनव बिंद्रा ऐस पब्लिक स्कूल स्थापित किए जाएंगे। इन स्कूलों में शिक्षा के एकेडमिक पहलू को अनदेखा तो नहीं किया जाएगा परंतु शिक्षा का केन्द्रबिंदु खेल होंगे जिस कारण खेलों से जुड़ी प्रत्येक सुविधा उपलब्ध करवाई जाएगी।

कहना कठिन है कि वह अपनी इस योजना में कहां तक सफल होते हैं परंतु इतना तय है कि यदि वह देश में इस प्रकार के 50 स्कूल भी स्थापित कर, उन्हें सुचारु रूप से चला सके तो 2020 तक उसके सुखद परिणामों की आशा की जा सकती है।

लेकिन यहां यह याद करना लाभदायक होगा कि इस प्रकार की योजना भारत सरकार द्वारा पहले भी लागू की जा चुकी है। सरकारी आंकड़ों की दृष्टि से उत्तर भारत में स्पोर्ट्स स्कूल जालंधर और लखनऊ, इस दिशा में सफल माने जाते हैं।

दुर्भाग्य से यहां जो प्रयास हुए, उनके परिणामस्वरूप जो खिलाड़ी उभरकर सामने आए, उनमें से इक्का-दुक्का खिलाड़ियों को छोड़कर सभी केवल राष्ट्रीय स्तर के मानदंड को ही छूने में सफल हो सके हैं।

इस साधारण सी सफलता का मुख्य कारण बड़ी आयु के खिलाड़ियों का कम आयुवर्ग में कोच की उपलब्धियों में चार चांद लगाने के लिए खेलना माना जाता है। जाहिर है कि ऐसी मजबूरियां बिंद्रा के स्कूलों में नहीं होंगी किंतु सफल खेल स्कूल के लिए क्या इतना ही काफी है?

आधुनिक खेल जीवन में खिलाड़ी की प्रतिभा को पहचानने से लेकर उसके आहार और मानसिक प्रशिक्षण तक पर लगातार ध्यान देना पड़ता है जिस कारण इन सभी विषयों के विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है।

चूंकि इन सभी क्षेत्रों में लगातार बदलाव और विकास होता है इसलिए यह आवश्यक होता है कि ऐसी संस्थाएं हों जहां इन विषयों पर लगातार अनुसंधान किया जाए ताकि वैज्ञानिक तरीके से मौलिकता को बनाए रखा जा सके और प्रशिक्षण खिलाड़ी के शरीर को उसकी योग्यता और प्रतिभा की सीमा को पहचानने में सहायता दे सके।

जैसे स्कूलों की परिकल्पना अभिनव बिंद्रा ने की है, उन्हें सफलता भी मिल सकती है किंतु यदि विभिन्न विषयों का मानव संसाधन और बौद्धिक ‘इनपुट’ देने वाले संस्थानों का समर्थन प्राप्त नहीं हुआ तो आशंका है कि सरकारी स्पोर्ट्स स्कूलों की तरह इनमें भी कुछ समय के बाद ठहराव आ जाएगा। इसके अतिरिक्त दूसरी बड़ी चुनौती पढ़ाई के स्तर पर आएगी। एक लंबे समय से खेल नौकरियों में कोटे के कारण उन्हें प्राप्त करने का साधन बन चुका है।

एक ऐसी शिक्षा पद्धति, जिसमें जब विद्यार्थी 100 में से 98 अंक भी प्राप्त कर लेता है तो उसकी इस बात को लेकर जवाब-तलबी होती है कि दो अंक कहां गायब हो गए, वहां पढ़ाई के दमपर नौकरी प्राप्त करना खिलाड़ी के लिए भगीरथ प्रयास बन चुका है।

लेकिन यदि सच में अभिनव बिंद्रा का 500 ऐसे स्कूल बनाने का सपना पूरा हो जाता है तो कौन जाने नौकरियों में कैसी योग्यता होनी चाहिए, उसकी परिभाषा भी बदलनी प्रारंभ हो जाए। इन संभावनाओं और आशंकाओं के बावजूद चंडीगढ़, हरियाणा और पंजाब के लिए तो यह स्कूल वरदान सिद्ध हो सकते हैं क्योंकि यथेष्ट सुविधाओं के न होने पर भी इस क्षेत्र ने खेलों को अपनी प्रतिभा और लगन के दम पर ही जिंदा रखा है जिस कारण कल्पना की जा सकती है कि वैज्ञानिकी ढंग से सुविधाओं के मिलने पर क्या पाया जा सकता है।

अकेले हरियाणा के खिलाड़ियों के प्रदर्शन ने ही मुक्केबाजी और कुश्ती के खेलों को नया आयाम दे दिया है। जिस प्रकार आम आदमी ने इन खिलाड़ियों में दिलचस्पी दिखाई है और जिस प्रकार उनके यश में भागीदारी के लिए राजनेताओं ने होड़ लगाई है, देश ही नहीं चीन के कूटनीतिज्ञों ने भी देखा है।

यही कारण है कि वियना के घटनाक्रम पर मिट्टी डालने के लिए चीन के प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत खेलों में पहला स्वर्ण पदक जीतने वाले अभिनव बिंद्रा से बेहतर सहारा और कोई दिखाई नहीं दिया। पर, अंग्रेजी के मुहावरे में यदि कहा जाए कि ‘मिलियन डॉलर’ प्रश्न यह है कि अभिनव बिंद्रा के महत्व को देश के राजनेताओं ने भी समझा है या नहीं, और क्या खेल संस्कृति के विकास में वह भी अपना योगदान देंगे या नहीं?

(लेखक जानेमाने स्तंभकार हैं





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