विकास मंत्रजब भी किसी के घर मैं पहली बार जाता हूं, यह सोचकर घबराता हूं कि कहीं मुझे गलत न समझ लिया जाए। दरअसल होता यह है कि मेरी आंखें उस घर के चारों ओर, यहां तक कि ड्राइंग रूम के दरवाजे तक के अंदर घूम-घूमकर कुछ टोह लेने लगती हैं।
यदि घर का मालिक मेरी इन निगाहों का कुछ गलत अर्थ लगा ले, तो वह गलती नहीं करेगा और मैं कसम खाकर कहता हूं कि मेरा मकसद भी गलत नहीं होता है।
असलियत तो यह रहती है कि मेरी निगाहें बड़ी बेकरारी के साथ उस सजे हुए बड़े से घर में एक ऐसा कोना ढूंढ़ रही होती हैं, जहां कुछ किताबें आराम फरमा रही हों, ताकि उन्हें देखकर मेरी आंखें जुड़ सकें। लेकिन अफसोस कि ज्यादातर मामलों में मेरी आंखों को यह सौभाग्य नहीं मिल पाता।
मैं सोचता हूं, आप भी सोचकर देखें कि अभी आप जो कुछ भी हैं, किसकी वजह से हैं? क्या ऐसा उन किताबों की वजह से ही नहीं है?
घर में अन्य ढेर सारी चीजों के लिए तो जगह है लेकिन उसी के लिए नहीं, जिसकी वजह से आप यह घर बना पाए हैं और यदि आपका यह घर पुश्तैनी है तो यूं कह लीजिए कि जिनकी वजह से आज आप बन पाए हैं।
मैंने पाया है कि किताबों से जुड़ना एक प्रकार से एक ऐसी अद्भुत शक्ति से जुड़ना होता है, जो हमारी भौतिक और मानसिक दुनिया को बेहद खूबसूरत बनाने की ताकत रखती है।
एक क्षण के लिए सोचकर देखिए कि यदि किताबें नहीं होतीं, तो हम क्या होते? फिर यह सोचिए कि यदि आज घर में किताबें नहीं हैं, तो हम क्या हैं? फिर यह कि यदि वे हो जाएं, तो हम क्या हो जाएंगे?
मित्रो! किताबों की पहुंच दिल और दिमाग तक ही नहीं, हमारी आत्मा तक होती है। संपूर्ण सेहत के लिए इससे बेहतर कोई दूसरी खुराक नहीं है और न ही इससे भला कोई दूसरा दोस्त।
-लेखक समय एवं जीवन-प्रबंध के विशेषज्ञ हैं।