संपादकीय.राजस्थान में जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में स्थित चामुंडा देवी के मंदिर में मची भगदड़ में सैकड़ों श्रद्धालुओं की जान चली गई है और सैकड़ों घायल श्रद्धालुओं को अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
मंगलवार से नवरात्र शुरू होने के कारण मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा हुई थी और मंदिर जाने के रास्ते में कथित रूप से एक दीवार के टूटने के कारण भगदड़ मच गई।
इस मामले का सबसे दु:खद पहलू यह है कि इस भगदड़ की जो वजह जोधपुर पुलिस बता रही है और मीडिया के माध्यम से जो वजहें प्रत्यक्षदर्शियों ने बताई है, वह हमारी पूरी व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर कर देती है।
शर्मनाक बात यह है कि कुछ लोगों को अपनी सामाजिक और आर्थिक हैसियत का प्रदर्शन ईश्वर के दरबार में भी करने में बेहद गर्व की अनुभूति होती है। यह आखिर किस मानसिकता को दर्शाता है?
देखा जाता है कि देश के कई मंदिरों में वीआईपी के लिए आम श्रद्धालुओं की भीड़ को पुलिस रोक देती है और उन्हें पूजा में कोई दिक्कत न हो, इसके लिए पुलिस और पूरा मंदिर प्रबंधन तत्पर हो जाता है।
जोधपुर के इस हादसे की जो वजहें सामने आ रही हैं, उससे पता चला है कि किसी खास व्यक्ति के लिए बाकी लोगों को रोका गया, जिसके बाद बढ़ती हुई भीड़ की वजह से भगदड़ मच गई।
हर घटना की तरह सरकार ने इस घटना की जांच के लिए भी एक कमेटी गठित कर दी है। जब तक यह कमेटी रिपोर्ट देगी, तब पता नहीं क्या-क्या बदल जाए और आए दिन हो रहे हादसों के बीच लोग शायद इस हादसे को भी भूल जाएं।
फिर कौन पूछेगा कि अधिसंख्य गरीबों और मजलूमों के इस देश में आगे से किसी वीआईपी की वजह से देश के दूसरे मंदिरों में भगदड़ नहीं मचेगी और अकारण श्रद्धालुओं की मौत नहीं होगी?
अभी दो महीने पहले ही अगस्त में हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में भूस्खलन के बाद मची भगदड़ की वजह से सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी। कुछ साल पहले ही महाराष्ट्र के सुदूरवर्ती मंढारा देवी मंदिर में भी मची भगदड़ में सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी।
पर इन सब मौतों से देश के मंदिर प्रबंधनों और हमारी व्यवस्था ने कोई सीख क्यों नहीं ली? पिछली घटनाओं की रोशनी में अगर भविष्य में बनने वाली योजनाओं पर विचार नहीं किया जाएगा, तो फिर आपदा प्रबंधन के लिए बनने वाली योजनाओं में ‘अनुभव’ शब्द का क्या अर्थ रह जाएगा?
मंदिरों में होने वाली घटनाओं के इतिहास पर अगर नजर डालें, तो लगता है कि हमारी व्यवस्था और मंदिर प्रबंधन विशिष्ट व्यक्तियों के लिए तो कुछ भी करने को तैयार रहता है, लेकिन आम श्रद्धालुओं के लिए कारगर और सुविधाजनक व्यवस्था बनाने में बिल्कुल रुचि नहीं लेता।