हे चामुंडे! मेरी यह चीत्कार केवल मृत्यु के लिए नहीं है। श्रद्धा का प्रवाह मेरा, किंतु तर जाते हैं आसुरी तत्व। महा-मेलों की सी भव्यता मुझ जैसे भक्तों से होती है- किंतु फल दिव्य प्राचीरों में बैठ इठलाते सत्तातंत्र संबद्धों को प्राप्त होते हैं। इत्र, पुष्प, बेल, कुंकुम जुटा तेरे दरबार में मैं आता हूं- किंतु सुगंध कर्तव्यविमुख प्रहरियों के अधिकार में जाती है। मेरे पितरों के जनक और मेरे संस्कारों की जननी मुझे शैशवकाल से एक ही शिक्षा देते-
या दैवी सर्वभूतेषु, शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:॥
पीढ़ी-दर-पीढ़ी नमन हम करते जा रहे हैं। किंतु सीढ़ी-दर-सीढ़ी समृद्धि केवल निर्मम, विमुख पा रहे हैं। हे चामुंडे! मुझे न तरने की कामना है, न यह भावना कि फल चाहिए ही। मुझे आसुरों से संघर्ष की शिक्षा चाहिए। ऊंची अट्टालिकाओं में नहीं जाना, किसी पवित्र कार्य की नींव बनना है।
समृद्धि नहीं, सद्बुद्धि पाने की ललक है। मां, वो मुझे तुमने दी भी है। इसीलिए मैं तुम्हारे पास बार-बार आता हूं। किंतु सहज सुरक्षा के लिए तैनात शासन-तंत्र के इन अमानवीय पुर्जो को कुछ सद्बुद्धि कब दोगी? इन्हें इनकी आत्मा कब धिक्कारेगी?
कभी मेरे सखा कोटा की चंबल पहाड़ियों पर बने गेपरनाथ के द्वार पर भयावह तरह से दब जाते हैं तो कभी मेरे भाई-बहन नैना देवी के आंगन में कुचल जाते हैं। दक्षिण के दुर्गा मालेश्वर मंदिर के कपाट हों या उड़ीसा में पुरी रथयात्रा- हम श्रद्धालुओं का अव्यवस्था के मेहरान गढ़ों से फिसलना सुनिश्चित है। जो नारियल आस्था का प्रतीक है- उसे ही निमित्त बनाकर मृत्यु मार्ग की ओर फिसलना मेरी नियति बन चुकी है।
नवरात्र में मेरी यही प्रार्थना है- मैं तो भक्त हूं। नासमझ हूं। भीड़ हूं। मेरा भारतवर्ष समूचा ही जयघोष करती श्रद्धालुओं की अनंत कतार है। हे मां, हमारी सुरक्षा के प्रबंध हों- यह कृपा तो कर दो। तुम्हारे पास आने की छटपटाहट कभी कम नहीं होगी। मुझे स्वीकार करो। जिन्हें आज तुमने अपने पास बुला लिया, उन्हें शांति दो।
और जिन जोधपुरवासियों ने श्रद्धावश सदियों से हर सुबह उठकर सबसे पहले किले की मेहरान पर केवल तुम्हें देखा है, आज इतने बड़े हादसे के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और सहयोग करते चले गए, तुम्हारे ही जयकारे लगाते, दु:ख बांटते चले गए, उन्हें और शक्ति दो। इसलिए, केवल इसीलिए मैं दोहराता हूं- हे मां! मेरी यह प्रार्थना मृत्यु से डरकर नहीं है।
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