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फिल्मकार और महाभारत

परदे के पीछे.फिल्मकार गोल्डी बहल फरमाते हैं कि संसार की रक्षा करने वाले को द्रोण और उनके मुखिया को द्रोणाचार्य कहते हैं। मुंबइया फिल्मकार और अमेरिका के फिल्मकारों में यही अंतर है कि वहां अर्थ जानने के बाद काम करते हैं और हमारे यहां अपनी सनक पर नाम रखकर फिल्म बनने के बाद उसका अर्थ खोजते हैं।

आगे गोल्डी खुलासा करते हैं कि उनकी फिल्म का महाभारत से कोई संबंध नहीं है, तो फिर द्रोण नाम रखने की क्या जरूरत थी? नायक की पोशाक देखकर लगता है कि इस फिल्म को गोल्डी भी कहा जा सकता था।

एक अन्य अखबार में यह बयान है कि अभिषेक की बहन श्वेता अपने बेटे का नाम द्रोण रखना चाहती है परंतु ससुराल वालों ने मना कर दिया। अत: भाई अभिषेक और भाई जैसे गोल्डी ने नाम रखा ‘द्रोणा’ गोयाकि यह फिल्म नहीं रक्षाबंधन का उपहार है।

परशुराम के शार्गिद थे भीष्म, द्रोणाचार्य, और द्रुपद। शिक्षा के दरमियान द्रुपद और द्रोण की गहरी मित्रता थी। द्रोण गरीब होने के कारण प्राय: दुखी रहते थे तो द्रुपद ने उन्हें राजा बनने पर आधा राज्य देने का वचन दिया परंतु कालांतर में वे अपने वचन से न केवल मुकर गए वरन उन्होंने द्रोण का अपमान भी किया।

द्रोण ऐसे शिष्य की तलाश में निकल पड़े जो द्रुपद और उसकी विशाल सेना को हराकर उनके अपमान का बदला ले। पांडव और कौरव बालकों की गेंद कुंए में गिरी तो द्रोण ने अनेक तिनके श्रंखला के रूप में कुंए में डालकर उनकी गेंद निकाली।

इसके बाद वे उनके गुरु बन गए और शिक्षा पूरी होने पर उन्होंने शिष्यों से गुरु दक्षिणा के तौर पर द्रुपद को हराने की बात कही। शिष्य द्रुपद को बंदी बनाकर लाए तो द्रोण ने अपने अपमान का बदला लेकर क्षमा स्वरूप उसका राज्य उसे लौटा दिया।

अपमानित द्रुपद ने तप करके पुत्री याज्ञसेनी अर्थात द्रौपदी को पाया और कालांतर में इसी यज्ञ की अगिA से उत्पन्न द्रौपदी के भाई ध्रष्टधिमA ने ही द्रोणाचार्य का वध किया था। हर पटकथा का संबंध महाभारत से है या होना चाहिए। यह बात भी गोल्डी को नहीं मालूम।

उनके पिता रमेश बहल ने भी रावण के पुत्र इंद्रजीत पर फिल्म बनाई थी और उसका संबंध भी रामायण से नहीं था। क्या फिल्म के नामकरण की गलतियां भी वंशपरंपरा का हिस्सा हैं। यह संभव है कि गोल्डी बहल ने सफल फिल्म की रचना की हो।

इस पूरे लेख का संबंध उनकी फिल्म द्रोण से नहीं है परंतु यहां यह कहने का प्रयास किया जा रहा है कि महान ग्रंथों से नाम लेने के समय किसी जानकार से परामर्श करने में क्या हर्ज है। फिल्म का नाम बॉक्स ऑफिस पर बहुत प्रभाव डालता है मसलन एक सार्थक सामाजिक फिल्म का नाम ‘बंबई मेरी जान’ रखकर दर्शकों को दूर भगा दिया। इस नाम पर वर्षो पूर्व अमीन सयानी न एक हादसा रचा था।

आज के युवा सितारे अपने बचपन के दोस्तों के निर्देशन में फिल्म कर रहे हैं और कुछ हादसे हो चुके हैं, कई और हो सकते हैं निर्देशक का चुनाव केवल उसकी निर्देशकीय योग्यता के आधार पर किया जाना चाहिए। बहरहाल फिल्म की समीक्षा देखने के बाद लिखी जाएगी। यह तो नाम को लेकर गोल्डी के बयान की प्रतिक्रिया मात्र है।





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swapnil upadhyay
Wednesday, 1st Oct 2008, 9:50
sahi hai kisi bhi vichar se pahle manthan hona jaruri hota hai.