पुराण संस्कृति के अनुसार, नवरात्रियों के द्वितीय दिन में ध्यातव्या, प्रशंसनीय और अनुकरणीय देवी ब्रंहाचारिणी स्वरूपा हैं, जो आद्यदेवी दुर्गा के के द्वितीय संदेश को वहन करती हैं।
ब्रrाचारिणी का मौलिक अर्थ है- ब्रrा चरितु चारयितु च शीलं यस्या: सा ब्रrाचारिणी परब्रrा की प्राप्ति करने और कराने का स्वभाव है जिनका, वे देवी ब्रंहाचारिणी हैं। उनके स्वरूप का निरूपण इस प्रकार किया गया हैं-
दधाना करपद्माभ्ययामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रrाचारिण्यनुत्तमा।।
ब्रंहाचारिणी नामक द्वितीय दुर्गा अपने एक हाथ में तपस्या ईश्वरप्रणिधान, ब्रrाचर्य-पालन, वेद स्वाध्याय परिगणन सूचक पावन अक्षमाला तो दूसरे हाथ में अमृत परिपूर्ण पवित्र कमण्डलु को धारण करती हैं। अक्षमाला केवल अक्ष नामक गोल गोल बीजों की ही माला यहां अभिप्रेत नहीं है अपितु अक्ष कहते हैं इंद्रियों को।
चक्षु, ध्राण, श्रवण, रसना व त्वक नामक पंच ज्ञानेन्द्रिय, पाणि-हाथ, पाद-पैर वायु मलद्वार, उपस्थ मूत्रद्वार व वाक-वाणी नामक पंच कर्मेन्द्रिय और मन इन गयारह इंद्रियों का समूह भी एक अक्षमाला है। आत्मा चेतन सत्ता, बुद्धि के द्वारा निर्णय कर अहंकार को छोड़ते हुए, मन के माध्यम से इन सभी इंद्रियों पर नियंत्रण करता है। अमृत कमण्डलुजीवन में भरने लगता है।
देवी ब्रrाचारिणी तप का आचरण करने वाली हैं। इनकी उपासना, आराधना करने से साधकों में तप, त्याग, वैरागय, संयम सदाचार व सद्व्यवहार की भावना प्रबल होती है। शरीर में विद्यमान आंतरिक ऊर्जा रज व वीर्य का भी नाम ब्रहा्र है। अत: ब्रrा्रचारिणी का अर्थ होता है आंतरिक ऊर्जा का निष्कासन, क्षरण न करने वाली देवी।
जगत सृजन में शक्ति का उपयोग करने हुए देवी दुर्गा जैसे ऊर्जा में लेशमात्र भी कमी नहीं आने देती, अपितु सर्वदा शक्ति-परिपूर्ण रहती हैं। ठीक वैसे ही गृहस्थी साधक संतोन्नपति के लिए ही शरीरस्थ ऊर्जा का उपयोग करें। रज वीर्यका व्यर्थ क्षरण न करें नहीं तो मरण सामने दिखाई देता हैं।
यह अदभुत संदेश देवी ब्रrाचारिणी देती हैं। द्वितीय दुर्गा ब्रंहाचारिणी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय, दिव्य और भव्य है। कारण इसमें ब्रrा्रचारिणी का ब्रrा्रचर्य है। कोई अन्य बाrा कारण इस दिव्यता के प्रति नहीं हैं। इससे संसार को यह संदेश मिलता है कि भक्तजन, साधक और इसी देवी के उपासक अपने शरीर की शोभा, सौंदर्य, निखार व चमक के लिए बाrा प्राकृतिक द्रव्य क्रीम पाउडर, लिपिस्टक व अन्य कृत्रिम साधनों की अपेक्षा जीवन में ब्रrाचर्य का पालन करें।
न क्रीमेण न चूण्रेन लिपिस्टिकेन वा तत:। संगृहस्यते हि सौंदर्य ब्रrाचर्य समाचार।। पुराण कथा है कि द्वितीय ब्रrाचारिणी ने पूर्वजन्म में पर्वतराज हिमालय के गृह में जन्म लिया था। नारद जी ने उन्हें शंकरजी को पति रूप में पाने की प्रेरणा की। इसलिए कठोर तपस्या के दौरान निर्जल, निराहार रूप अनेक तप किए। बेलपत्रों का आहार किया। उसका भी त्याग कर देने के कारण यह देवी अर्पणा कहलाईं।
उनका शरीर कृश हो गया। अंतत: देवताओं, ऋषियों, मुनियों, सिद्धजनों ने उनकी तपस्या की प्रशंसा की और ब्रrा जी की कृपा से शंकर को पति के रूप में पा लिया।
संपूर्ण कथा और इस तपस्विनी देवी के भव्य स्वरूप का सारांश यह है कि व्यक्ति भक्ति की शक्ति से आसक्ति रहित हो कर अपूर्व अमृत से अपना कमण्डलु पात्र भर लेता है ओर शंकर देवता के सानिध्य में रहकर गरल पान करते हुए अमृत का वितरण और आवंटन समाज को करने लगता है। अत: इस दुर्गा देवी का स्मरण, आराधना, अर्चना, अनुकरण भी अनिवार्य व आवश्यक बताया गया हैं।