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Chandigarh Chandigarh चंडीगढ़ वे हंसमुख हैं, जिंदादिल हैं। उनके भीतर जज़्बा है हालात से लड़ने का। मुश्किलों को हराने का और हर हाल में जीत हासिल करने का। रोटरी क्लब की पूर्व प्रेजिडेंट सुरिंदर बैंस अपने इसी जज़्बे के बल पर कैंसर जैसी भयानक बीमारी को मात दे चुकी हैं।
मोहाली के रोटरी क्लब में एक मुलाकात के दौरान सुरिंदर बैंस ने बताया कि उनकी जिंदगी का मकसद अब दूसरों की मदद करना है। इसके लिए वे हर समय तैयार रहती हैं।
उन्हें दिसंबर 1998 का वह दिन आज भी झकझोर देता है, जब पीजीआई की रिपोर्ट में उन्हें ब्रेस्ट कैंसर होने की पुष्टि हुई और डॉक्टर ने तुरंत सर्जरी कराने को कहा। रिपोर्ट पॉजीटिव होने और सर्जरी की बात सुनकर वे सन्न रह गई। यकीन करना मुश्किल था कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हो गया है।
बैंस ने इस स्थिति में खुद को मजबूत किया और अपने परिवार के लिए ब्रेस्ट कैंसर से लड़ने का फैसला किया। उन्होंने पति के नजदीक न होने के बावजूद सर्जरी कराने का फैसला किया।
सर्जरी के वक्त पति साउथ अफ्रीका में थे। मैसेज मिलने पर वे पहुंचे लेकिन तब तक सर्जरी हो चुकी थी। डॉक्टरों ने बैंस की सर्जरी कर राइट ब्रेस्ट को रिमूव कर दिया था, इस जगह को भरने के लिए लंदन से प्रोस्थेसिस मंगवाए गए थे।
रेडिएशन से झड़ गए बाल: सर्जरी के बाद जब बैंस को रेडिएशन दी जा रही थीं, उस समय उनके बाल झड़ गए थे, इसे छुपाने के लिए वह सिर पर सफेद स्कार्फ बांधा करती थी, चूंकि उससमय सर्दियां थीं इसीलिए किसीको पता नहीं चला उनका ट्रीटमेंट चल रहा है।
जिंदगी में आए बदलाव :
बीमारी के बाद लगा मानो भगवान ने बाकी का जीवन बोनस में दिया है। इसीलिए अब हर पल का उपयोग करना चाहती थी। तब रोटरी क्लब के माध्यम से जरूरतमंदों की सहायता करने का निर्णय लिया, जिसे अब भी जारी रखे हुए हैं।
क्या है ब्रेस्ट कैंसर का कारण :
वेस्टर्नाइजेशन का ज्यादा असर, अधिक मोटापा, कम बच्चे होना, देर से शादी, देर से मां बननाऔर मेनोपॉज में देरी होना, इसके कारण होते हैं।
जल्दी पहचान तो इलाज भी :
ब्रेस्ट में थोड़ी सी भी परेशानी महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए, क्योंकि बीमारी का जल्दी पता लगने से ब्रेस्ट रिमूव होने से बच जाता है, इलाज की संभावनाएं ज्यादा होती हैं।
ब्रेस्ट रिमूव की जरूरत कब :
बीमारी के दूसरी या तीसरी स्टेज में पहुंचने पर मरीज को बचाने के लिए डॉक्टर के पास ब्रेस्ट रिमूव करने के अलावा कोई चारा नहीं होता।
लेकिन बचाव के रास्ते भी हैं :
1. 40 साल के बाद हर साल एक बार मैमोग्राफी और सर्जन से चेकअप करवाएं। 2. 30 साल की उम्र केबाद हर महीने ब्रेस्ट की सेल्फ एग्जामिन करें। 3. हेल्दी लाइफ स्टाइल अपनाएं, संतुलित खाना खाएं और रोज एक्सरसाइज करें।
ट्रीटमेंट का प्रोसेस :
पीजीआई के डिपार्टमेंट ऑफ रेडियोथैरेपी एंड ऑन्कोलॉजी के पूर्व हेड डॉ. बी.डी. गुप्ता कहते हैं, सर्जरी, रेडियोथैरेपी, कीमोथैरेपी से इस बीमारी का इलाज किया जाता है। एडवांस्ड स्टेज में रेडियोथैरेपी और कीमोथैरेपी के कॉम्बीनेशन से इलाज किया जाता है। कई केसेज में लंबी दवाओं से भी इलाज संभव है।
ली कार्बूजिए ने स्वयं पर लिखी दो किताबें भी हस्ताक्षर कर ज्ञानी रत्न सिंह को दी थी। सेंटर का उद्घाटन ली काबरूजिए के 121वें जन्मदिवस पर 6 अक्टूबर को किया जा रहा है।
स्पेशल कॉर्नर होगा फोटोग्राफ्स का:
सेंटर के नोडल अफसर वी.एन. सिंह के मुताबिक जसविंद्र सिंह की तरफ से दिवंगत ज्ञानी रत्न सिंह और ली कार्बूजिए के फोटोग्राफ्स स्पेशल कॉर्नर में लगाए जाएंगे। सेक्टर-19 में सेंटर का वहीं निर्माण किया जा रहा है, जहां बैठकर ली कार्बूजिए व उनके सहयोगियों ने चंडीगढ़ की रूपरेखा तैयार की थी।
काफी यादें जुड़ी हैं सेंटर से:
जसविंद्र सिंह के अनुसार सेक्टर-19 के ली कार्बूजिए के इस ऑफिस से उनकी काफी पुरानी यादें जुड़ी हैं। बचपन में वे भी अपने पिता के साथ यहां आते थे और ली कार्बूजिए को मॉडल बनाते देखते थे। उन्हीं से प्रेरणा लेकर उन्होंने आर्किटेक्ट बनने का फैसला किया।
ली कार्बूजिए सेंटर में 9 कमरे हैं। इनमें से पहले रूम में रिसेप्शन, दूसरे में खुदाई से मिला सामान, तीसरे में डॉक्यूमेंट्स और बिल्डिंग्स के मैप और मॉडल, चौथे और पांचवें रूम में ली कार्बूजिए की फोटोग्राफ्स, छठे रूम में शहर के निर्माण से पहले की गई डीटेल स्टडी, सातवें रूम में शहर का मास्टर प्लान, डिजाइन की गई टेबल, चेयर्स, आठवें रूम में रेफरेंस और डिजिटल लाइब्रेरी, नौवें रूम में एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिस बनाया जाएगा।
विदेशी टूरिस्ट्स आते हैं स्टडी के लिए:
यहां कुल टूरिस्ट्स में से 35 से 40 फीसदी विदेशी होते हैं। अधिकांश ली कार्बूजिए की अर्बन प्लानिंग व आर्किटेक्ट को देखने व स्टडी के लिए आते हैं। इनमें फ्रांस, इटली, हांगकांग, यूके, जर्मन, इजराइल, जापानी अधिक होते हैं। शहर की संरचना ह्यूमन बॉडी के आधार पर की गई है।