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श्मशान में जिंदगी

गुरदासपुर श्मशान का नाम आते ही एक ऐसी जगह की तस्वीर उभरती है जहां जीवन यात्रा पूरी करने के बाद पार्थिव शरीर को लाया जाता है। मगर यहां से सात किलोमीटर दूर गांव चावा में एक वृद्ध दंपती वर्षो से श्मशान में रहने पर मजबूर है।

वृद्ध और वरिष्ठ नागरिकों के लिए कई योजनाएं चलाने का दम भरने वाली सरकारों के सामने 65 साल के बोधराज और उनकी पत्नी शोभारानी एक सवाल की तरह खड़े हैं। इन दोनों को श्मशान में रहने पर डर नहीं लगता। बकौल दंपती जहां एक दिन हर किसी को आना पड़ता हो, उस जगह से क्या डरना।

श्मशान से उठी बेटियों की डोली:

बोधराज ने बताया कि उनका जन्म किराए के मकान में हुआ था। जब किराया देना भारी पड़ा तो श्मशान में आ गए। तब तक उनकी शादी हो चुकी थी और दो बेटियों का बोझ उनके कंधे पर था।

बेटी कृष्णा और राधा का विवाह उन्होंने श्मशान से ही किया। जहां अर्थी आती है,वहां से दोनों की डोली विदा हुई।

पान बेच कर गुजारा करने वाले बोधराज पांच महीने पहले पठानकोट में एक दुर्घटना में गंभीर रूप से चोटिल हो गए और तभी से बिस्तर पर हैं। उन्हें इस बात पर रंज है कि उन्हें आज तक कोई सरकारी सहायता नहीं मिली। वृद्धावस्था पेंशन या गरीबों के लिए मकान जैसी योजनाएं तो शायद उनके लिए है ही नहीं।





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