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जो लौट के घर न आए

सुबह-सुबह चामुंडा माता के दर्शन करने घर से निकले वे जवान वापस घर नहीं लौट सके। मरने वालों में अधिकांश ऐसे थे जिन्होंने बीस बसंत भी पार नहीं किए थे।

जवान मौतों से पूरा शहर शोक में डूब गया। मथुरादास माथुर अस्पताल में जिसे भी अपना कोई फर्श पर पड़ा दिखा, वे उसकी नब्ज देखने में लग गए। जब उन्हें पता चलता कि उसकी सांसें थम चुकी है तब भी उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था।

वे डाक्टरों से अनुरोध कर रहे थे कि वे उसके भाई, भतीजे, चाचा को देख लें। डॉक्टर जब निराशा में सिर हिलाते तो पूरा परिवार चीख उठता।

मरने वालों में ज्यादातर पुरुष हैं, उनमें भी युवा और किशोरों की संख्या है अधिक हैं।

किसको बांधूंगी राखी

एक लड़की अपने भाई की लाश के पास बैठी रो रही थी। वह बार-बार एक ही बात दोहरा रही थी, ऐ मां, अब मैं किसे राखी बांधूगी।

आंसू और पुकार

एमडीएम में माहौल बेहद दर्दनाक था। शहर के लोगों ने पहली बार एक साथ इतनी लाशों को देखा था। वहां घायलों की मदद करने आए लोगों की आंखों में आंसू थे। कुछ महिलाएं तो चीख-पुकार करती ही अस्पताल पहुंची। सबकी आंखें किसी अपने को खोज रही थी।

पिता-पुत्र की जली चिता

भील बस्ती निवासी सुखाराम और उसके पुत्र विजय कुमार ने चामुंडा मां के सामने ही दम तोड़ा। पिता-पुत्र की अर्थियां एक साथ उठीं और इनका पास-पास ही अंतिम संस्कार किया गया। इस परिवार को संभालने वाला कोई नहीं था। स्थानीय लोगों को परिवार को सदस्यों को सांत्वना दी।

एक कॉलोनी से 11 अर्थियां

कलाल कॉलोनी में दोपहर के वक्त जब 11 शव पहुंचे तो पूरे इलाके में मातम छा गया। बाद में सभी 11 शवों की सामूहिक शव यात्रा निकली।





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