जोधपुर.
चामुंडा मंदिर हादसा एक साथ सैकड़ों गोद सूनी कर गया। मरने वाले इतने थे कि श्मशान में चिताएं जलाने के लिए स्थान और लकड़ियां कम पड़ गईं। अंतिम श्रद्धांजलि के लिए पूरा शहर श्मशान में उमड़ आया।
हादसा ही कुछ ऐसा था कि शहर के श्मशानों की आंख भी नम हो गई। प्राय: एक बार में एक चिता जहां जलती थी, आज वहां एक या दो नहीं, कहीं-कहीं तो चार से सात तक चिताएं जलीं।
सिवांची गेट स्थित विभिन्न समाजों के श्मशानों में बने पक्के चबूतरों के अलावा जहां भी थोड़ा सा स्थान मिला, लकड़ियां जमाकर शवों को अग्नि को समर्पित किया गया।
आंसू बहाने का वक्त ही न मिला :
जिन परिवारों के चिराग बुझ गए, उन घरों में लोगों को अपने प्रिय के जाने पर आंसू बहाने तक का वक्त भी नहीं मिला। लोग सोच ही नहीं पा रहे थे कि अपने लाल के खोने पर आंसू बहाएं या पड़ोसी की आंख के आंसू पोंछें। यहां तो हर गली-मोहल्ले-कॉलोनियों से अर्थियां उठ रही थीं।
जैसी सामथ्र्य, वैसी सेवा :
लोग तो शव लेकर श्मशानों में पहुंच रहे थे, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो शव लेकर आने वालों को लौटते समय ठंडा पानी पिला रहे थे। सिवांची गेट श्मशान घाट से ठीक पहले करीब दो दर्जन लोग शीतल जल के टैंक भर खड़े थे और आग्रह करके लोगों की प्यास मिटा रहे थे। नगर निगम ने अंत्येष्टि के बाद लौट रहे लोगों के नहाने के लिए वहां बने टैंक में पानी भरने की व्यवस्था की। निगम की गाड़ी ने कई फेरे लगाकर पानी पहुंचाया।
राजा का राज लुट गया :
जालोरी गेट बारी निवासी राजा के दो बेटे मुकेश और दिलीप को अग्नि को समर्पित कर लौट रहे लोग रो पड़े। एक कहने लगा, ‘राजा का राज लुट गया। हे भगवान क्या हो गया! देवी से खुशहाली का वर मांगने गए इन भक्तों से क्या भूल हो गई जो जीवन की ज्योत ही बुझ गई।’ तभी कोई बोला, अशोकसिंह गहलोत का हेम भी चल बसा। बड़ा निर्दयी है विधाता। नवरात्रि कालरात्रि बनकर आई।
बहुत रुलाएंगी उनकी यादें :
सिवांची गेट श्मशान से पूर्व शवों के विश्राम स्थल पर एक शव के साथ आया देवीलाल बिफर पड़ा, कहने लगा, ‘नवरात्र की यह यादें बहुत रुलाएंगी। मरना तो सभी को है, मगर ये मरना कैसे करें स्वीकार। देवी के दरबार में क्या इसीलिए गए थे। हर गली में अर्थी..हे चामुंडे, किस अपराध की सजा दी इस शहर को।’
ऐसा हादसा जीवन में नहीं देखा :
गीता भवन के वाहन में मधुबन हाउसिंग बोर्ड, कुड़ी भगतासनी, इसाइयों का कब्रिस्तान व अन्य क्षेत्रों से सात से अधिक लाशें लेकर वाले ड्राइवर लक्ष्मणसिंह ने भीगी आंखों से कहा, ऐसा हादसा जीवन में नहीं देखा। कैसे भरेंगे ये जख्म? दीपावली की खुशियां ही लूट ले गई नवरात्रि। कल फिर से नया सूरज उगेगा, लेकिन जिन घरों के चिराग ही बुझ गए, वहां रोशनी कभी न हो सकेगी।
नेता भी पहुंचे श्मशान :
अपने प्रियजनों को खोने वाले तो उनके शव लेकर श्मशान पहुंचे थे लेकिन इस विपदा की घड़ी में कई नेता, समाजसेवी भी श्मशानों में युवाओं को लकड़ी देने पहुंचे। इनमें बाड़मेर-जैसलमेर के सांसद मानवेन्द्र सिंह, भाजपा के जिला अध्यक्ष नारायण पंचारिया, युवा मोर्चे के देहात जिलाध्यक्ष भोपालसिंह बड़ला, शिवसेना हिन्दुस्तान के जिलाध्यक्ष सुरेश जैन सहित अनेक लोग वहां पहुंचे।
दोपहर 11.45 बजे :
प्रजापति समाज के श्मशान घाट में एक-एक कर छह युवाओं के शव लाए गए। वे सभी 18 से 25 वर्ष की उम्र के थे। उनके परिजनों का रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था। रुदन, चीत्कार और हा-हाकार के बीच कुछ लोग मृतकों के परिजनों को संभालने और ढाढ़ंस बंधाने की कोशिश कर रहे थे। श्मशान घाट पर समाज के लगभग दो हजार लोग मौजूद थे।
बहुजन समाज पार्टी के नेता चंद्रप्रकाश देवड़ा और भाजपा नेता घनश्याम मेघवाल पहुंचे। इन्होंने लोगों को ढाढंस बंधाने की कोशिश की। सभी शव अग्नि को समर्पित किए गए। हादसे में मारे गए युवाओं के परिजनों की चीत्कार व्याकुल कर देने वाली थी। समाज के युवक कमलेश प्रजापत ने बताया कि सूंथला में समाज के श्मशान घाट में दो युवकों का अंतिम संस्कार किया गया।
इतनी बड़ी संख्या में लोग प्रजापत समाज के श्मशान घाट पर पहली बार दिखाई दिए। यहां मौजूद लोगों की आंखें नम थीं। कुछ लोग दहाड़े मार कर रो रहे थे तो कई लोग अपनी रुलाई को रोकने का विफल प्रयास कर रहे थे।
दुखों का टूटा पहाड़
मसूरिया स्थित भील बस्ती पर मानो पहाड़ ही टूट पड़ा। इस बस्ती में रहने वाले भील समाज के पांच जनों की जान इस हादसे में चली गई। मरने वालों में चार जने तो खेलने-कूदने की उम्र के थे।
उनकी आयु 11 से 12 वर्ष ही थी। पूरी बस्ती में रोने के अलावा दूसरा कोई स्वर सुनाई नहीं दे रहा था। अपराह्न् तीन बजे बाद पांचों की अर्थियां उठी एक साथ उठी तो वहां मौजूद हर किसी का दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया। घरों में हाहाकार मच गया। औरतें विलाप करने लगीं। भील समाज के श्मशान घाट पर ये शव पहुंचे तो हर किसी की आंखें भीगी थीं। अर्थी को कंधा देने वालों की मानो कमर ही टूट गई थी।
अस्पताल
सुबह आठ बजे : मथुरादास माथुर अस्पताल में बदहवास लोग अपने परिजनों को ढूंढ रहे थे। हर कोई जानने को उत्सुक था कि उनका कोई रिश्तेदार या परिचित को मृतकों में नहीं है। उन्हें सही जानकारी नहीं मिल रही थी। कौन दे जानकारी? लाशें आ रही थी। घायल आ रहे थे। कौन जिंदा है, कौन मर चुका? किसकी पहचान कौन करे? ऐसे अफरा-तफरी भरे माहौल में भीड़ के शोर में खो गई कई परिजनों की चीत्कारें।
क्या करूं, कहां ढूंढ़ू
तीन-चार साल का बच्च गोद में लिए संतोष इधर-उधर भटक रही थी। उसे सूचना मिली की उसके भाई का साला इस हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गया है। मगर उसे कोई बता नहीं पा रहा था कि वह है कहां और किस हाल में। उसने कहा, क्या करूं? कहां ढूंढू? कुछ पता नहीं चल रहा है।
मेरा दोस्त नहीं मिल रहा
यही स्थिति महेंद्र की थी। उसने आक्रोश जताते हुए कहा मेरा दोस्त सतीश नहीं मिल रहा। न जाने कहां है? कोई नहीं बताता। महात्मा गांधी अस्पताल गए तो पता चला एमडीएम ले गए हैं, यहां भी जवाब नहीं मिल रहा है। रोहिणी को अपने पुत्र हितेश की तलाश थी तो केशर अपने पति रमेश को खोज रही थी। हादसे के हाहाकार में उनकी आवाज कोई नहीं सुन रहा था।
श्मशानों में पहुंचें
मथुरादास माथुर अस्पताल में करीब बारह बजे घोषणा की गई कि अस्पताल में अब किसी का शव नहीं है। केवल कुछ घायल हैं। लोगों से अनुरोध है कि वे अपने श्मशानों में पहुंचें।
खून की दरकार
एक और घोषणा की गई कि गोयल अस्पताल और महात्मा गांधी अस्पताल में बी निगेटिव खून की दरकार है। लोगों से अपील की जा रही थी कि वे इन अस्पतालों में पहुंचें और ब्लड डोनेट करें।
मदद को उठे हाथ
न जात, न पात, न धर्म न मजहब, हर कोई मदद को आतुर था। जेजे ग्रुप के मोहम्मद आरिफ राव, रईस मोहम्मद केके, मोहम्मद सद्दीक राजू, मोहम्मद अश्फाक और कई लोग हर तरह से मदद कर रहे थे।