जोधपुर. चामुंडा मंदिर हादसा एक साथ सैकड़ों गोद सूनी कर गया। मरने वाले इतने थे कि श्मशान में चिताएं जलाने के लिए स्थान और लकड़ियां कम पड़ गईं।
ग्यारह बजे से ही उठने लगी अर्थियां
ज्यादातर मौतें युवाओं की होने से रीत के अनुसार परिजनों ने देरी न करते हुए जल्दी ही अर्थियां उठानी शुरू कर दी थीं। ज्यादातर समाजों के श्मशान सिवांची गेट के समीप होने से अधिकांश शव यहां के श्मशानों में ही ले जाए गए। सुबह ग्यारह बजे के बाद से ही शवों का श्मशानों तक पहुंचना शुरू हो गया था।
कलाल कॉलोनी में 11 अर्थियां उठी
कलाल कॉलोनी के 11 जनों की अर्थी एक साथ उठी। कॉलोनी में मातम छा गया। कॉलोनी में दोपहर तक शव पहुंचे और फिर सामूहिक शवयात्रा निकली तो हर किसी का दिल पसीज गया। मृतकों की उम्र 15 से 25 वर्ष के बीच थी।
कॉलोनी की छह नंबर गली में 15 वर्षीय अजय की मौत से उसकी मां बेहोश हो गई। पिता जगदीश पहले ही दुनिया छोड़ गए। अब बेवा का एक ही सहारा था, वो भी छिन गया। यहीं के विक्रम का शव कॉलोनी में पहुंचा तो हाहाकार मच गया। विक्रम के पिता की हाल ही मौत हुई थी।
पिता-पुत्र मरे, साथ ही चिता जली
भील बस्ती निवासी सुखाराम व उसके पुत्र विजय कुमार ने चामुंडा मां के सामने ही दम तोडा। पिता-पुत्र की अर्थियां एक साथ उठीं और इनका पास-पास ही अंतिम संस्कार किया गया। पिता-पुत्र को कंधा देने वालों की हालत खराब हो गई। बड़ी मुकिश्ल से क्षेत्र के लोगों ने इस परिवार को संभाला।
इकलौता पुत्र नहीं रहा :
भील बस्ती का चतुराराम उर्फ शंभू इकलौता पुत्र था। पिता चौथराम की पूर्व में ही मृत्यु हो गई थी। अब मां बेसहारा हो गई। उसका बुढ़ापे का सहारा नहीं रहा। बस्ती के लोगों व रिश्तेदारों का उस मां को संभालना भारी पड़ रहा था।
कंधे भी नसीब न हुए बहुतों को चामुंडा के दर्शन की राह में आत्मोत्सर्ग करने वाले बहुत से जवानों को कंधे तक नसीब न हुए। श्मशान घाटों की तरफ जाने वाली राह पर बड़ा कारुणिक दृश्य था। श्मशान घाट की राह में राम नाम सत्य है.की ध्वनि मन को भीतर तक झकझौर रही थी।
हादसे ने शहर की अंतरात्मा को घायल कर दिया। सिवांची गेट श्मशान स्थल पर ऐसे दृश्य इससे पहले शायद ही देखे गए होंगे। दूर-दूर से लोग शवयात्रा में शामिल होने आए थे। कोई आंसू बहा रहा था, कोई चीत्कार रहा था। कोई ढांढ़स बंधाते-बंधाते खुद रो पड़ा। किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी का साला, किसी का बहनोई, किसी के पड़ोसी के जीवन की ज्योत मां चामुंडा के दर पर बुझ गई। आस्था की चौखट से मिली मौत के बाद निकली अर्थियां।
शव वाहिनियों ने लगाए कई फेरे
अधिकांश इलाकों के एक-एक गली में कई युवाओं की मौत होने से उनके शवों को कंधों पर ले जाने की बजाय शव वाहिनियों को मदद ली गई। शहर में गीता भवन में रहने वाली अम्मा मेवी देवी, बाबा वेंसीमल अयानी रथ, लोढ़ा परिवार की शव वाहिनी सहित करीब एक दर्जन शव वाहिनियों में एक से चार-चार तक शव लाए जा रहे थे।
इन वाहिनियों के पीछे मृतक के नाते-रिश्तेदार व मित्र दुपहिया वाहनों पर चल रहे थे। बहुत से शव लोडिंग टैक्सियों, टाटा 407 जैसे वाहनों में लाए जा रहे थे। प्रतापनगर से सिवांची गेट के इस मार्ग पर वाहनों की ऐसी रेलमपेल पहले कभी नहीं देखी गई।
एक-एक श्मशान में जली कई अर्थियां
रावणा राजपूत समाज के श्मशान में चार-चार अर्थियां साथ जल रही थीं और श्मशान के पिछवाड़े खाली स्थान पर अन्य शवों के लिए लकड़ियां रखी जा रही थीं। किसी को जैसे होश ही नहीं रह गया था।
दो घंटे में ही भर गया एमजीएच
आपातकालीन वार्ड में घायलों को बचाने की कोशिश की जा रही थी। शहर के सभी वरिष्ठ डॉक्टर सहित तमाम रेजिडेंट डॉक्टर आपातकालीन वार्ड में पहुंच गए। डॉक्टरों की टीम आने वाले हर हताहत को बचाने में जुट जाती। जब सारी कोशिशें बेकार हो जातीं तो वे दूसरे घायल की जान बचाने में जुट जाते।
हर ओर था कोहराम
मथुरादास माथुर अस्पताल में सुबह आठ बजे कोहराम मचा था। मेहरानगढ़ से लाशों और घायलों को लाया जा रहा था। अस्पताल की इमरजेंसी व आईसीयू इकाई में फर्श पर करीब तीस लोगों की लाशें पड़ी थीं। लोग लाशों को देखकर अपने-अपने रिश्तेदार को तलाश रहे थे। जिसे अपना कोई भी रिश्तेदार वहां दिखा, वे उससे लिपट कर रोने लगे, वहां क्रंदन मचा हुआ था। लाशें आ रही थीं और लोग अपने प्रियजन को पहचान कर ले जा रहे थे।
खाली होती रही टैक्सियां
मेहरानगढ़ से लाशों व घायलों को लाने के लिए शहर के सवा सौ से अधिक टैक्सी चालकों ने निशुल्क सेवाएं दीं। मथुरादास माथुर अस्पताल में चिकित्सकों द्वारा एक-एक कर लोगों को मृत घोषित करने के साथ ही उन्हें ले जाने के लिए टैक्सी चालकों ने अपनी टैक्सियां अस्पताल परिसर में लगा दीं। अक्सर आलोचना का शिकार होने वाले शहर के टैक्सी चालकों ने इस हादसे में कमाल कर दिया।
हादसे की सूचना मिलते ही जो जहां था, मेहरानगढ़ की तरफ दौड़ पड़ा। मथुरादास माथुर अस्पताल में चौथे फेरे में घायलों को लेकर पहुंचे इकबाल ने बताया, ऐसे सबाब के मौके मिलते ही कहां है, ऐसे में किससे भाड़ा मांगें और क्यों मांगें? अल्लाह ऐसी नेकी ही बरकत देता है। इसी तरह बहुत सी निजी एबुंलेंस वालों ने भी अपनी सेवाएं दीं।
सभी हतप्रभ रह गए
संभागीय आयुक्त किरण सोनी गुप्ता, जिला कलेक्टर नरेशपाल गंगवार, सिटी एसपी मालिनी अग्रवाल सहित तमाम अधिकारी सुबह साढ़े आठ बजे मथुरादास माथुर अस्पताल पहुंचे। वहां मचा हुआ कोहराम देखकर वे भी हतप्रभ रह गए। अस्पताल में पहले से ही पुलिस व आरएसी के जवानों में मोर्चा सम्भाला हुआ था। पुलिस के दो जवान लापता लोगों की सूची बना रहे थे। हर कोई अपने रिश्तेदारों के बारे में जानने को उत्सुक था।
पोस्टमार्टम कब करते
अस्पताल में हालत यह हो गई कि लोग अपने मृतक रिश्तेदारों को बिना पोस्टमार्टम करवाए ही वहां से ले गए। इतना समय था भी किसके पास कि वहां किसी का पोस्टमार्टम किया जाता। चिकित्सक तो घायलों को बचाने की जुगत में लगे थे।
पहले घायलों को बचाएंगे
जिला कलेक्टर नरेशपाल गंगवार से मृतकों के बारे में पूछा तो वे बोले, पहले जिनकी सांसें चल रही हैं, उन्हें बचाने का प्रयास किया जा रहा है। उनके मोबाइल की घंटी बार-बार बज रही थी। अस्पताल में इतना शोर था कि किसी को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। परेशान होकर कलेक्टर ने अपना फोन पीआरओ को पकड़ा दिया ताकि कोई किसी सूचना से वंचित न रहे।
विश्वास कैसे करते
लोगों को एकाएक विश्वास ही नहीं हो रहा था उनका कोई अजीज अब नहीं रहा। डॉक्टर द्वारा मृत घोषित किए जाने के बाद भी उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था। मथुरादास माथुर अस्पताल में कलाल कॉलोनी से आए लोग अपने-अपने प्रियजन की तलाश कर रहे थे। लाशें वहां फर्श पर इस तरह पड़ी थीं मानो सारे लोग एक कतार में सो रहे हों। पूरा फर्श खून से लथपथ हो चुका था।
मांओं ने खोए लाल
इस हादसे का सबसे दुखद पहलू यह रहा कि मरने वालों में अधिकांश जवान लोग थे। शहर की कितनी ही मांओं की गोद सूनी हो गई। एक मां को जैसे ही पता चला कि उसका लाल नहीं रहा तो वह अस्पताल परिसर में ही फर्श पर पड़ी लाशों के पास ही बेहोश हो गई। उसके साथ आए लोगों ने उसे संभाला।
कहां गया मेरा भाई
एक लड़की अपने भाई की लाश के पास बैठी रो रही थी। वह बार-बार एक ही बात दोहरा रही थी, ऐ मां, अब मैं किसे राखी बांधूंगी, मेरा भाई कहां गया।
आंखों में आंसू और पुकार
एमडीएम में माहौल ऐसा था कि देखा नहीं जा रहा था। शहर के लोगों ने पहली बार इतनी लाशों को देखा था। वहां घायलों की मदद करने आए लोगों की आंखों में आंसू थे। कुछ महिलाएं तो चीख-पुकार करती ही अस्पताल पहुंची। सबकी आंखें अपने किसी न किसी परिचित को खोज रही थी।