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चेहरे की झुर्रियों में मुस्क राती जिंदगी

राजनांदगांव. old आंसू जिंदगी बन गई है। सुख हो या दुख नैना बरस पड़ते है। सुख जीवन के किस्से सांसों में अटक कर रह जाते हैं। फिर भी चेहरे की झुर्रिया अनुभव की मुस्कान बिखेरतीं हैं। शहर के वयोवृद्ध रजनीकांत सचदेव (78) अपनी पत्नी प्रमिला सचदेव (76) साथ वृद्धाश्रम में गुजर बसर कर रहे हैं।

श्री सचदेव को साइकोलाजिकल बीमारी है। वे बात करते समय रो पड़ते है। इसी बीमारी की वजह से उन्हें वाकर की मदद से चलना पड़ता है। याददाश्त कमजोर है लेकिन स्मृति पटल पर संघर्ष की छाप अभी भी बाकी है।

इस दौरान हर पल उनका साथ निभाने वाली उनकी धर्मपत्नी इस बात की गवाह हैं। भास्कर से चर्चा में श्रीमती सचदेव ने जीवन के खट्टे-मीठे पल बांटे। श्रीमती सचदेव ने बताया कि वृद्धाश्रम में रहने का फैसला उन दोनों ने खुद ही लिया है। इसके लिए परिस्थितियों को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उनकी तीन बेटियां हैं। तीनों की शादी हो चुकी है। बड़ी लड़की शशीकला बेन मानिक की शादी राजनांदगांव के तेंदूपत्ता व्यवसायी मधुकांत भाई मानिक के साथ हुई है। बाकि दो बेटियां अहमदाबाद और नागपुर में ब्याही गई हैं। वृद्धश्रम का सारा खर्च श्री मानिक वहन करते हैं।

बिजनेस में घाटा : श्रीमती सचदेव ने बताया कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के समीप स्थित सीतापुर गांव में अनाज का बहुत बड़ा कारोबार था। श्री सचदेव कमीशन एजेंट का काम करते थे। करोड़ों की संपत्ति थी। किसी बात की कोई कमी नहीं थी। सन 1985 में बिजनेस डांवाडोल हो गया।

करोड़ो का घाटा हुआ। इसकी वजह से सब कुछ समेट कर वे राजनांदगांव आ गए। उनकी बड़ी बेटी और दामाद ने उनकी जिंदगी संवारी। इस दरमियान श्री सचदेव चुस्त दुरुस्त थे। उन्होंने कारोबार में अपने दामाद का हाथ बंटाना शुरू किया। कारोबार का सारा हिसाब-किताब उनके जिम्मे था। इस बीच अचानक उनकी तबियत बिगड़ी। बेटी-दामाद ने उन्हें आराम करने कहा। सारी सुविधाएं मुहैया कराई। रहने के लिए कार्टेज दिए। समय पर जरुरत का सामान दिया। किसी चीज की कमी नहीं होने दी।

अकेलेपन ने पहुंचाया वृद्धाश्रम : श्रीमती सचदेव ने बताया कि बीमारी के कारण उनके पति की हालत बिगड़ने लगी। सामान्य बातचीत के दौरान भी वे रो पड़ते थे। एक तरह का अकेलापन उनहें सताने लगा। इससे तंग आकर उन्होंने वृद्धाश्रम जाने का विचार बनाया। उनकी इस सोच से बेटी और दामाद दोनों सहमत नहीं थे। इसके बावजूद बुजुर्गो की बात उन्होंने रखी। श्री सचदेव कहते हैं कि उन्हें वहां घर से बेहतर माहौल मिला है। वे खुश हैं। वृद्धाश्रम में सारी व्यवस्था है।

सारे लोग एक परिवार की तरह रहते है। एक व्यवस्थित दिनचर्या के बीच जीवन कट रहा है। श्रीमती सचदेव का कहना है कि वृद्धाश्रम में सारा सुख है। वहां अकेलापन महसूस नहीं होता। उन्हें वहां आए तकरीबन एक साल हुए हैं। इस पूरे वर्ष में एक बार भी गम का एहसास नहीं हुआ। हर पल की खुशी मिलती रही। उन्होंने मुस्कुराते हुए अपनी सखी डेहरीन साहू से मुलाकात करवाई। श्रीमती साहू भी अपनी इच्छा से वहां रह रहीं है। स्टेशन पारा निवासी डेहरीन साहू का इस दुनिया में कोई नहीं। पति के गुजरने के बाद भाई ने उन्हें संभाला। उनकी अपनी कोई औलाद नहीं है।

हंसते-मुस्कराते बीतता है दिन
वृद्धाश्रम के मैनेजर सुरेश कुमार खंडेलवाल ने बताया कि वहां 36 वृद्ध रहते हैं। इनमें 23 महिलाएं और 13 पुरुष शामिल है। दीन, हीन, लाचार लोगों के लिए आश्रम ही घर है। सभी बुजुर्ग शहर के आसपास से ही हैं। एक अनुशासित दिनचर्या के बीच पारिवारिक माहौल बना हुआ है। बुजुर्गो की सेवा कर पुण्य प्राप्त करने वालों का रेला लगा रहता है।

टीवी पर धार्मिक सीरीयल देखने सारे लोग एक जगह इकट्ठा हो जाते हैं। खूब हंसी-ठिठोली भी होती है। श्री खंडेलवाल ने बताया कि 1 अक्टूबर को वृद्धाज्ञम में विभिन्न आयोजित संस्था कार्यक्रम करेगी। जिसमें समाज सेवियों के अलावा शहर के गणमान्य लोग भी शिरकत करेंगे।





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