इंदौर. आज सत्य-अहिंसा के साकार रूप महात्मा गांधी का जन्मदिन है। यह मौका है अपनी अच्छाइयों को निखारने और कमियों को दूर करने का। इसके लिए गांधीजी के बताए रास्ते और उनके जैसे दृढ़ संकल्प की जरूरत है।
त्याग, अनुशासन की मिसाल इंदौर में है। अब संकल्प लें कि जहां पिछड़े हैं, वहां से उठकर गांधीजी का सपना सच कर दिखाएं। बापू हमें ऐसी सन्मति मिले कि आगे ही बढ़ते जाएं।
शहर के लगभग 150 लोग बचपन से तन पर खादी और दिल में गांधी को बसाए हुए हैं। ये स्वावलंबन के सूत्र को अपनाकर चरखा चलाते हैं और खादी पहनते हैं। ऐसे ही शख्स हैं गांधी स्मारक निधि के सचिव रहे बालकृष्ण जोशी।
सुदामानगर के श्री जोशी का परिवार 1945 से खादी के वस्त्र और गांधी के विचार अपना रहा है। श्री जोशी की पत्नी गीता, मां नर्मदा पिता विश्वनाथ, सास-ससुर और बच्चे डॉ.सुधीर जोशी, साधना, डॉ. अर्चना जोशी व आराधना जोशी सहित परिवार के सभी सदस्य खादी पहनते हैं।
ऐसे ही शशिकांत शुक्ल भी बचपन से ही खादी पहन रहे हैं। वे मानते हैं गांधी के अर्थशास्त्र के इस अंग को तो नेपोलियन ने भी माना था। नवलखा निवासी छगनलाल सोलंकी खुद खादी वस्त्र भंडार से गांधी के विचारों को बांट रहे हैं। बेटियां भी खादी को जीवन का स्वावलंबन मानती है। नामदेव सरोदे, भालचंद पाठक, श्यामसुंदर यादव, ललितकुमार दुबे, किशोर गुप्ता, जसवंतराव भाईजी जैसे लोगों ने भी मयपरिवार के खादी और गांधी को जीवन बना लिया है।
खादी के लिए बापू खत
शहर के ही डॉ. करुणाकर त्रिवेदी के माता-पिता को महात्मा गांधी ने करीब 80 पत्र लिखे। 29 सितंबर 1930 को भेजे गए इस पत्र में गांधीजी ने त्रिवेदी दंपति को खादी पहनने के लिए प्रेरित किया था। तब से त्रिवेदी परिवार आजतक खादी ही पहन रहा है।