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शिव की देह पर काली का पैर

durga नवरात्र शुरू हो गए हैं। उत्सवी माहौल है, देवी पूजन के साथ-साथ गरबों की धूम है। दरअसल, पूरा भारतीय समाज उत्सवप्रिय है। वह अधिक समय तक दु:ख में नहीं जी सकता।

उसके लिए दु:ख और सुख सहज, स्वाभाविक भाव हैं जिन्हें हर एक को जीना ही होता है फिर दु:ख के शोक और संताप को लंबा क्यों खिंचा जाए? इस समाज की पूजा भी मौन नहीं सामूहिक उल्लास है। नवरात्र पूजन में मां के भजन गाकर गरबा नृत्य के साथ उनकी आराधना की जाती है।

गुजरात का यह गरबा अब लगभग पूरे देश में लोकप्रिय हो गया है। नवरात्रि में मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और मां काली तीनों देवियों की आराधना की जाती है। धन-संपदा, सौभाग्य देने वाली मां लक्ष्मी, विद्या-ज्ञान और बुद्धि देने वाली मां सरस्वती और शक्ति, ऊर्जा अन्याय का प्रतिकार करने वाली मां काली हमारे जीवन की ये ही तीन शक्तियां सारे कार्यो का स्रोत हैं और उनका संचालन करती हैं। हम प्राय: महिषासुर मर्दिनी मां दुर्गा की आराधना करते हैं, विधिवत उन्हीं का पूजन और पाठ करते हैं।

सबसे अधिक सशक्त, चुनौतीपूर्ण चरित्र मां काली हैं। महिलाओं की असीम शक्ति, सत्ता और बल का प्रतीक हैं। वे किसी भी अन्याय, अशिष्टता और दुष्टता को सहन नहीं करतीं। अपने आत्मसम्मान और प्रतिष्ठा को वे इतना सर्वोच्च मानती हैं कि इस पर आंच आते ही उनके क्रोध की सीमा नहीं रहती और इस क्रोध को नियंत्रित करने में सभी देवता यहां तक कि स्वयं भगवान विष्णु भी असमर्थ हो जाते हैं।

इनकी कथा बहुत ही रोचक और संदेशात्मक है। राक्षसों का अन्याय और अत्याचार बहुत बढ़ गया। देवता प्रतीकार नहीं कर पा रहे थे। उसी समय पार्वती गंगा से स्नान कर बाहर निकली थी। उन्होंने देवताओं के इस अवसाद का कारण पूछा तब ब्रrाजी ने बताया कि राक्षसों का अत्याचार कितना बढ़ गया है। तब और वे हतोत्साहित हैं, निराश हैं। पार्वतीजी ने सभी देवताओं को ललकारते हुए कहा कि अपनी शक्ति को जग्रत करो। इस तरह पराजित भाव कैसे स्वीकार कर लिया।

क्या राक्षसों की राक्षसीवृत्ति देवताओं के देवत्व पर भारी पड़ रही है, परंतु देवताओं का आत्मसम्मान और शौर्य न जागा। पार्वती अति क्रोधित हो उठीं, उनके मुख से क्रोध की ज्वाला निकली। यही महाकाली थीं जिन्होंने राक्षसों का अत्यंत पराक्रम और साहस से विध्वंस किया।

मुंडों की माला गले में डाली। उनके इस असीमित क्रोध से राक्षसों का अंत तो हो ही गया, पर अब इस क्रोध को रोकने या शांत करने की शक्ति किसी में नहीं थी। अंतत: शिव से प्रार्थना की गई। शिव बाल रूप में देवी काली के चरणों में लेट गए। तभी काली का पांव उन पर पड़ा और वे चैतन्य हुईं कि यह तो उनके पति पर पैर आ गया है, तुरंत उन्होंने ओह! किया और दांतों तले जीभ दबा ली। महाकाली की बाहर निकली जिह्वा उनकी इसी चेतना का प्रतीक है।

महिलाओं को आज जिन राक्षसी वृत्तियों, दुष्टताओं का बाहर और भीतर सामना करना पड़ रहा है उसी संदर्भ में देवी काली का चरित्र बहुत प्रेरणादायी है। किसी भी प्रकार के अन्याय को चुपचाप सहना नहीं है, उससे पीड़ित होकर आत्महत्या का रास्ता नहीं अपनाना है।

उसके प्रतिकार स्वरूप क्रोध करना है। ऐसा क्रोध जो असीमित हो, जिसे कोई झुका न सके। आत्मसम्मान केवल आत्मबल से ही पाया जा सकता है। बल ही वह क्रोध है जिसकी ज्वाला और तेज के आगे पुरुष फिर चाहे वह पति ही क्यों न हो उसे भी झुकना पड़े। यदि नारी गरबों का लास्य और भाव है तो वह प्रताड़ना के विरुद्ध खड़ी होने वाली काली भी है।





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