संपादकीय. राजस्थान में रिफाइनरी लगाने का मुद्दा राजनीतिक बयानबाजी में अब इतना उलझ गया है कि प्रदेश का बड़ा आर्थिक संबल बनने वाली यह योजना शायद ही मूर्तरूप ले सके।
आज भले ही ऐसा लग रहा हो कि केंद्र व राज्य में अलग-अलग दलों की सरकार होने के कारण रिफाइनरी का मामला खटाई में पड़ा हो, लेकिन पिछले पचास वर्षो की वह तस्वीर भी ऐसा कोई सुनहरा पन्ना नहीं दिखाती है जब केंद्र व राज्य में एक ही दल की सरकार रही है। सच तो यह है कि राजस्थान अपने यहां निवेश की दौड़ में हमेशा पिछड़ता चला आया है। इसी कारण यह प्रदेश आर्थिक व सामाजिक पिछड़ेपन को आज भी ढोने को अभिशप्त है।
अत: केंद्रीय पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्री राजस्थान में रिफाइनरी के बारे में जब यह बयान देते हैं कि राजस्थान के सांसद ही इस मामले में एकमत नहीं हैं तो उनके बयान में इस प्रदेश को इसी का हक दिलाने की ध्वनि से अधिक राजनीतिक पैंतरेबाजी ही दिखाई देती है।
नब्बे के दशक में बने प्रशासनिक सुधार आयोग ने पेट्रोलियम क्षेत्र के बारे में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि राज्य के बजट में करों से प्राप्त होने वाले कुल राजस्व से अधिक आय अकेले तेल के क्षेत्र से मिल सकती है। लेकिन ऐसा केवल रॉयल्टी की आय से संभव नहीं होगा, इसके लिए राज्य में रिफाइनरी लगाना बेहद जरूरी है।
इतनी स्पष्ट तस्वीर के बाद भी केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री आज भी जब यह तर्क देते हैं कि राज्य सरकार जब तक ओएनजीसी द्वारा मांगी गई सुविधाएं और रियायतें नहीं देगी तब तक रिफाइनरी लगाना संभव नहीं है, इसलिए गले नहीं उतरता कि जब मथुरा, बीना और भटिंडा के मामले में बिना तेल की उपलब्धता राजनीतिक फैसले लिए जा सकते हैं, तो राजस्थान जहां तेल के भंडार उपलब्ध हैं वहां के लिए राजनीति क्यों हो रही है?
राज्य सरकार के स्तर पर भी इस अति महत्वपूर्ण मुद्दे पर निर्णय लेने में हुए असाधारण विलंब व प्रशासनिक दक्षता के अभाव ने भी रिफाइनरी का मामला उलझाने में बड़ी भूमिका निभाई है। यहां इस बात को रेखांकित करना भी आवश्यक होगा कि पिछले वर्ष बाड़मेर में रिफाइनरी लगाने की मांग को जिस तरह का जनसमर्थन मिला था उसका लाभ भी राज्य सरकार नहीं ले पाई थी, लेकिन राज्य सरकार चाहे तो स्वयं भी एक कंपनी प्रमोट करके एक बार फिर रिफाइनरी की उम्मीदों को जिंदा कर सकती है, पर इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है।