दृष्टिकोण. यदि भूमंडलीकरण का उद्देश्य माल, ज्ञान और आखिरकार व्यक्ति की सुरक्षित और वैध तरीके से आवागमन की आजादी है, तो परमाणु व्यापार के संदर्भ में भारत-अमेरिका 123 समझौते पर अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स का जबरदस्त समर्थन एशिया और अफ्रीका में रहने वाले लाखों लोगों के लिए उत्साहवर्धक संदेश है, जहां इन तीनों क्षेत्रों में उतनी आजादी नहीं है।
अब इस समझौते को सीनेट की मंजूरी चाहिए, जो तकरीबन तय है। ताकतवर सीनेट फॉरेन रिलेशन कमिटी ने पहले ही इस समझौते को मंजूरी दे दी है। विडंबनात्मक ढंग से, यह चरमोत्कर्ष उस प्रक्रिया के अंत का भी संकेत देता है जिसकी शुरुआत ऐसे राष्ट्रपति ने की थी, जिसकी विदेश नीति की सर्वत्र निंदा हुई और इसे आगे बढ़ाने वाले प्रधानमंत्री को भी निंदा का पात्र बनना पड़ा, यहां तक कि कुछ लोगों ने उन्हें रीढ़विहीन तक कह डाला।
फिर भी इन दोनों शख्सियतों ने साथ-साथ चलते हुए हमारे समय के एक बड़े मिथक को तोड़ दिया है। एक द्वैतवादी मिथक, यह परंपरा बनाम आधुनिकता और पूरब बनाम पश्चिम को लेकर है। इसके मूल में यह बात है कि पश्चिमी जगत यानी विज्ञान का महारथी, औद्योगिक क्रांति और आधुनिक जीवन शैली का गढ़ और जो इन आविष्कारों के प्रवाह में आगे बढ़ता जा रहा हो, बेजोड़ ढंग से उस उच्च-तकनीक को विकसित करने की क्षमता रखता है, जो आधुनिक जीवनचर्या को परिभाषित करता है।
इसके उलट प्राचीन परंपराओं और गरीबी के जाल में उलझे भारतीय अद्यतन विज्ञान और किसी जबरदस्त शोध के लिहाज से सांस्कृतिक तौर पर खुद को अक्षम पाते हैं और इस तरह हम निष्क्रिय उपभोक्ता के अलावा कुछ और नहीं हो सकते जो पश्चिमी विज्ञान और तकनीक का लाभ पाकर अनुगृहीत हों। यह एक व्यापक मिथक है जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों समुदायों में आकार ले रहा है।
हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश द्वारा तैयार किया गया यह समझौता इन परंपरागत धारणाओं के भार से मुक्त है। इस परमाणु समझौते के मूल में यह भाव है कि तकनीकी नवीनीकरण सांस्कृतिक या भौगोलिक विशेष नहीं है, वरन यह ज्ञान के उन्मुक्त प्रवाह पर निर्भर है। इस तरह मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश ने ऐसा समझौता तैयार किया, जो ज्ञान के उन्मुक्त प्रवाह के अवरोधों को मिटाकर उच्च-तकनीकी व्यापार के दरवाजे खोल दे। एक बार 123 समझौते पर अंतिम मुहर लग जाती है, तो भारत वैधानिक तौर पर ताजा-तरीन अमेरिकी तकनीकों तक पहुंच सकेगा। यह समझौता बदनाम अमेरिकी कंपनियों के वर्चस्व को बीच में रोकता है जो ऐसी तकनीकों के मेजबान को हम तक पहुंचने की राह में मुख्य बाधा रही हैं क्योंकि वे ‘दोहरे इस्तेमाल’ के तौर पर बंटे हुई हैं।
आवश्यक ढंग से, उच्च तकनीकों की एक रेंज, उनको री-प्रोसेस करने की क्षमता और उन्हें नए और अद्यतन तरीके से लागू करने को लेकर ज्ञान और विचारों के संप्रेषण में आने वाले अवरोध खत्म कर दिए गए हैं। ऐसे दौर में जिसे इतिहासकार एक दिन ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था का जन्म कहेंगे, किसी कार्य को करने की पद्धति के ज्ञान तक आसानी से पहुंचने के नतीजों पर ज्यादा जोर नहीं दिया जा सकता।
इसके नतीजे तेजी से महसूस होंगे क्योंकि तकनीकी विकास के लिए भारत में प्रयोगशालाएं और वैज्ञानिक व माल की प्रचुरता की जरूरत है। इस समझौते की तमाम जगह आलोचना की गई और आज भी की जा रही है लेकिन इसके ज्ञान संबंधी आयाम पर शायद ही किसी ने ध्यान दिया है। इसकी बजाय, बहस परमाणु अप्रसार और परमाणु शक्ति की सुरक्षा जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द सिमट गई जो इस समझौते के सारतत्व की अपेक्षा इसके तथाकथित विशेषज्ञों और टिप्पणीकारों की गुजरे जमाने की मानसिकता के बारे में ज्यादा बताता है।
पहले तो परमाणु अप्रसार संबंधी चिंताएं शीत युद्धकालीन मानसिकता की उपज हैं जहां हर एक का सुर अलग-अलग और टालमटोल वाला रहा चूंकि प्रत्येक कैंप अपनी-अपनी तकनीक और खुद को दूसरों से छिपाना चाहता था। ज्ञान के अवरोधों के बगैर दुनिया के गरीबों की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए ऐसी सोच को मिटाना जरूरी था।
भारत-अमेरिका संधि तीन महान आजादियों में दूसरे स्थान पर है। इसमें पहली है आमतौर पर व्यापारवाद और खासतौर पर बुलियनवाद के बारे में पश्चिमी धारणा का खात्मा जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन के फिर से लौटकर आने के साथ ही खत्म हो गया। परमाणु अप्रसार कोई मसला नहीं है। भारत ने परमाणु हथियारों के परीक्षण का अधिकार बरकरार इसलिए नहीं रखा कि यह तकनीक अंतरित हासिल करना चाहता है, बल्कि वह तो केवल न्यूनतम प्रतिरोधी क्षमता चाहता है, विध्वंसक ताकत को वह ज्यादा तरजीह नहीं देता। इस पर संदेह जताने वाले पूछते हैं कि यदि ग्लोब पर ग्रीनहाउस गैसों की एक और परत चढ़ाए बगैर दुनिया के कुछ निर्धनतम लोगों के लिए ऊर्जा सुरक्षा का निर्माण करना ही इसका लक्ष्य है तो अमेरिका भारत को साफ-सुथरी तकनीकें विकसित करने में मदद क्यों नहीं करता? क्योंकि, जैसा कि मौसमीय बदलाव के संदर्भ में अंतर-सरकारी पैनल कहता है, परमाणु शक्ति से पैदा होने वाली प्रति यूनिट बिजली पर जितनी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, उतना ही ‘ऊर्जा के अक्षय स्रोतों से भी होता है।
वैसे भी दुनिया के लाखों-करोड़ों लोगों के लिए बेहतर बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के लिहाज से ऊर्जा की जरूरतें इन शाश्वत संसाधनों से पूरी नहीं हो सकतीं। वापस आधुनिकता को सहारा देने वाली तीन महान आजादियों की ओर लौटते हैं। अंतिम आजादी बिना किसी विघ्न के आगे बढ़ने की क्षमता है। यदि कोई एशियाई ज्ञान का आयात कर सकता है और बगैर किसी अवरोध के धन को इधर-उधर भेज सकता है, तो फिर आखिर वह खुद इस दमनकारी अप्रवासन नियंत्रणों के अधीन क्यों रहे जो पश्चिमी देशों में चलन में आ चुके हैं?
अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दुनिया को गहन आर्थिक व सामाजिक कायाकल्प के मुहाने पर ले आए हैं, लेकिन इसके लिए आने वाली पीढ़ियों को भी अपना काम करना होगा।
-लेखक सामाजिक-आर्थिक मामलों के टिप्पणीकार हैं।