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आज दो अक्टूबर है, गांधीजी का जन्म दिवस। दिल्ली में सुबह से ही गांधीजी की समाधि राजघाट पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी सहित हजारों लोग गांधीजी की स्मृति में श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे, मगर दुखद यह है कि उनके द्वारा सिखाई गई हर एक बात को हमने स्वतंत्रता के इन साठ वर्षो में भुला दिया।
उनकी किसी भी सीख पर अमल न करते हुए भारत को समृद्ध और सिरमौर बनाने के लिए हमने न जाने कितनी उछल-कूद मचाई, फिर भी आज हम कहां खड़े हैं? गांधीजी ने भारत के विकास का गहरा मर्म खोज लिया था। ‘अनटू द लास्ट’ के लिए ‘अंत्योदय’ शब्द दिया था-‘अंत का उदय’। उनकी सोच स्वतंत्रता और समृद्धि के सच्चे अर्थ से जुड़ी हुई थी। आज भारत की जनता की क्या हालत है?
विश्व बैंक ने भारत की गरीबी के संबंध में प्रति व्यक्ति आय पर आधारित जो रिपोर्ट जारी की है उसके अनुसार 1981 से 2006 के बीच देश के आम आदमी की आय पर आधारित आंकड़ों की दृष्टि से भारत में गरीबों की संख्या में 398 लाख, मतलब चार करोड़ की बढ़ोतरी हुई है।
आर्थिक सुधारों को जादुई छड़ी मानने वाले लोगों को जानकारी देने के लिए विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में साफ किया है कि आर्थिक सुधारों के वर्तमान समय में जो माना जा रहा है कि भारतीयों की प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी हुई है। लेकिन प्रति दिन के एक डॉलर की कमाई के बजाय 1.25 डॉलर की आय का यदि हिसाब लगाया जाए तो भारत में गरीबों की संख्या में 9.6 प्रतिशत यानी लगभग दस प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
याद कीजिए कि उन दिनों को जब स्वराज का ही सुर चारों तरफ सुनाई देता था, तब भी गांधीजी ने हमसे एक ही बात कही थी कि ‘भारत गांवों में बसता है’ और दूसरी सीख नए बने शासकों को ये दी थी कि ‘कोई भी निर्णय लेते समय यह ध्यान रखो कि उस निर्णय का आम जनता पर क्या असर होगा’ इस बात को उन्होंने एक गुरुमंत्र कहा था, लेकिन गुरु के जाने के बाद आजाद भारत के इतने वषरें में अब गुरुमंत्र भी विदा हो गया है।
इसमें कोई शक नहीं कि भारत के करोड़ों ग्रामीण लोगों की हालत आज भी दयनीय है। इस पर भी 12 प्रतिशत मुद्रास्फीति का भार और लगातार कमजोर हो रही आर्थिक परिस्थितियों में ग्रामीण जनता को तो बहुत कुछ सहन करना पड़ रहा है। 1971 में इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था, तब से चुनाव आयोग और आर्थिक विशेषज्ञों ने गरीबी उन्मूलन को आंकड़ों के खेल में उलझाकर रख दिया है।
विश्व बैंक की रिपोर्ट में आय के आधार पर गरीबों की संख्या की बात नहीं की गई, बल्कि गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाली जनसंख्या में कमी की बात कही गई। मनमोहन सिंह, पी. चिदंबरम और मोंटेक ¨सह अहलुवालिया की तिकड़ी ने भी वाषिर्क विकास दर को आठ-नौ और दस प्रतिशत के उलझाऊ आंकड़ों में देश की आम अवाम को उलझा दिया है।
गांधीजी की यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि भारत गांवों में बसता है, मगर अब तक तो हमने सिर्फ गांवों को तोड़ने और शहरों की आबादी बढ़ाने का काम ही किया है। अब इससे बचने के लिए अरबों रुपए की लागत वाली ‘नूर्म’ योजना लाई गई है। क्या यह आसमान फटने पर पैबंद लगाने जैसी बात नहीं है? विकेंद्रित विकास की अवधारणा पर अमल करने की जगह अब तक हमने विकास को महज कुछ ही जगहों पर केंद्रित करके नहीं रखा है? गांधीजी गांव को भूख, बेरोजगारी और रोगों से मुक्तबनाना चाहते थे, पर यहां तो राष्ट्र की प्राकृतिक संपदा, जल, खनिज पदार्थो को कुछ हाथों में लुटाया जा रहा है। इस संपत्ति का एक अंश भी गरीबों को नहीं मिल पा रहा है।
गरीबी उन्मूलन की बात को फिलहाल यदि ताक पर रखकर अच्छे प्रशासन की बात भी की जाए, तो उसमें भी हमारी नीतियां तारीफ करने लायक नहीं हैं। योजनाओं के अमल की जानकारी बताती है कि 275 योजनाओं का खर्च डेढ़ लाख करोड़ संभावित था उसमें से सिर्फ एक लाख करोड़ खर्च हुआ है।
गांधीजी ने ‘अंत्योदय’ में आम आदमी के विकास को भी गिना था, लेकिन इसको तरह-तरह के चमकदार नारों और शब्दों में बांधकर गरीबों को लुभाने की कोशिशें होती हैं। गरीब और गांव के बारे में बात करने वाले गांधीजी ने कभी यह साबित करने की कोशिश नहीं कि वे अर्थशास्त्री हैं। उनकी 139वीं जन्मतिथि के अवसर पर नेताओं को खुद से सवाल पूछना चाहिए कि उन्होंने गांधीजी की कितनी बातें मानीं?