Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे.
हमारे यहां भाई-भाई के दौर चलते हैं। एक जमाने में हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे लगाए जाते थे। आजकल हिंदी-अंग्रेजी के बहनापे का दौर है। उपरोक्त गानों की पंक्ति में दो शब्द हिंदी के हैं और दो अंग्रेजी के। यह गीत फिल्म ‘जाने तू या जाने ना’ के निर्देशक अब्बास टायरवाला ने लिखा है और उनके नाम में भी मिश्रण है।
यह सही है कि फिल्म में गाने का दृश्य बड़ा सटीक आया था और बोल उसके अनुरूप ही हैं। सारे पात्र भी मस्ती मंत्र वाले युवा हैं और इस तरह की मिश्रित भाषा ही यह वर्ग बोलता है। नायक का नाम पप्पू नहीं है परंतु फिल्म में नायिका को भी म्याऊं कहकर पुकारा गया है। शिक्षा परिसरों में भी ऐसा ही होता है।
कुछ वर्ष पूर्व चॉकलेट के एक विज्ञापन में पप्पू के पास होने पर मुंह मीठा कराया जाता है। लगातार फेल होने वाला पप्पू पास हो गया है। जब अभिषेक की फिल्म ‘गुरु’ सफल हुई थी तब प्राय: कहा जाता था कि पप्पू पास हो गया, क्योंकि चॉकलेट का विज्ञापन अमिताभ बच्चन द्वारा अभिनीत था।
फिल्म की अवधि कुछ भी हो अमिताभ कमाल का अभिनय करते हैं। इतने सफल कलाकार का पुत्र होने के कारण ही अभिषेक से अपेक्षाएं भी अधिक होती हैं और आलोचना भी कटु हो जाती है। बरगद के नीचे किसी पौधे का पनपना आसान नहीं होता। यूं तो अमिताभ के पिता भी अत्यंत लोकप्रिय थे परंतु उनका कार्यक्षेत्र अलग था।
बहरहाल मनोरंजन क्षेत्र में मिश्रित भाषा का प्रयोग कम प्रमाण में अरसे से चला आ रहा है। ‘आना मेरी जान संडे के संडे’ और दिलीप कुमार ने भी गाया है, ‘ये सूट मेरा देखो ये बूट मेरा देखो।’ अमिताभ बच्चन भी ‘तूफान’ में गा चुके हैं, ‘आगे भी प्राब्लम पीछे भी प्राब्लम, डोंट वरी बी हैप्पी।’
फिल्म उद्योग में प्रारंभ से ही अनेक भाषाओं के बोलने वाले जुड़े हैं, इसीलिए पटकथा अंग्रेजी में लिखी गई और मुंशीनुमा अनुवादक को संवाद लेखक का पद दिया गया। यह एकमात्र फिल्म बनाने वाला देश हैं जहां संवाद को पटकथा से अलग माना गया। इसी हादसे से जन्में हैं अनेक हादसे। यह भी सच है कि हिंदी के प्रति कोई प्रेम नहीं होने के बावजूद गीत-संगीत के कारण अनेक गैर हिंदी लोगों ने हिंदी सीखी है।
फिल्म ही नहीं वरन पत्रकारिता और अन्य क्षेत्रों में भी हिंदी-अंग्रेजी की मिलावट का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। पहले के जमाने में विजेता का पहला प्रहार पराजित की स्त्री पर और दूसरा भाषा पर होता था। यही विजय का पुरस्कार और पराजित का दंड था कि वह अपनी भाषा नहीं बोल सकता। कुंठित अभिव्यक्ति का परिणाम ही था अंतहीन दासता।
आत्मा का कवच भाषा होती है। भाषाहरण के बाद आत्मा के बचने का कोई अवसर नहीं रह जाता। बाजार की शक्ति से संचालित दुनिया में भाषा के चिरंतन महत्व को घटा दिया है। टेक्नोलॉजी ने भी नया सांस्कृतिक वातावरण रचा है। दरअसल बाजार की ताकतों के लिए यह आवश्यक है कि उपभोक्ता की भाषा में मिलावट आ जाए ताकि वह जीवन के लिए जरूरी और गैरजरूरी का भेद ही नहीं कर सके।
जो बाजार हर नए उत्पाद के जन्म के समय ही उसके मृत्यु की तिथि भी निर्धारित करता है ताकि नए मॉडल के लिए बाजार बना रहे, वह बाजार उपभोक्ता की आत्मा को गुलाम बनाना चाहता है और भाषा की खिचड़ी इसके लिए आवश्यक कदम है। सिनेमा बाजार तंत्र का ही एक हिस्सा है।