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पंजाब में ही सच हुआ गांधी का सपना

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने खुशहाल और आत्मनिर्भर गांवों में बसे भारत का सपना देखा था। मैंने बचपन से पंजाब को देखा है, लगता है गांधी जी का यह सपना यहीं पूरा हुआ है। मुझे लगता है कि पंजाब का सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट इसकी मैनपावर है।

इसी ने ही विदेशी आक्रमणकारियों को वापस भागने पर मजबूर किया था, इस ताकत ने ब्रिटिश हुकूमत के लिए और उसके खिलाफ कई युद्ध लड़े थे और फतह हासिल की थी। आज किसी भी प्रतियोगिता में देख लें पंजाबी पीछे जा रहे हैं। खेलों में हमारा जो दबदबा था, अब कहां हैं हालांकि अभिनव बिंद्रा की जीत एक सुखद अनुभूति है।

पंजाब के कई क्षेत्रांे में पिछड़ जाने को कैसे सही किया जाए, आज यही सबसे बड़ा सवाल है। प्रशासकों के गैर जिम्मेदाराना रवैये, अराजकता और धार्मिक असहनशीलता ने गांधी के सपनों की राह में हमेशा रोड़े अटकाए हैं। यही कारण रहा ग्रामीणों का शहरों की ओर पलायन हुआ। यहां उन्हें लगा कि नौकरी, पैसा, सुख और साधन सब कुछ मिल सकता है। संपन्न हुए तो ग्रामीण नशे की ओर झुके। ज्यादा पैसे के लिए उन्होंने विदेशों की ओर रुख किया और इसके परिणाम भी ठीक नहीं रहे।

मैं मानता हूं कि सबसे पहले मैनपावर को सही ट्रैक पर लाना होगा। ग्रामीणों का शहर और विदेश की ओर पलायन रोकना होगा। मगर कैसे!

ये तभी संभव होगा जब गांवों में हायर एजुकेशन, बिजली, पानी और स्वास्थ्य सेवाओं की सुविधा शहरों की तरह हो जाए। राज्य सरकार गांवों में शिक्षण संस्थान खोलकर जॉब ओरिएंटड कोर्स करवाए। छोटे और मंझोले किसानों को कृषि विविधिकरण की ओर प्रोत्साहित करे। राज्य में धार्मिक संस्थाओं के पास काफी धन संपदा है। वे इस पैसे को गांवों के विकास में लगाएं। दरअसल फंड्स की कोई कमी नहीं है, जरूरत है सही आदमी तक सही मदद पहुंचाने की।

राजनीतिज्ञ हमेशा पक्षपात करते हैं और अपने क्षेत्र को तरजीह देते हैं। इससे लोगों में अविश्वास बढ़ता है। मेरा सपना है कि एक ऐसा पंजाब हो जिसमें स्वस्थ, धनवान, सुशिक्षित और तरक्कीयाफ्ता लोगों का निवास हो, जहां आबादी कम हो और लोग बाबा नानक के संदेश पर चलते हुए एक-दूसरे के काम आएं, जहां प्रशासन सही ढंग से काम करे और ऊंच-नीच का नामोनिशान न हो।

मैं अब जिंदगी के आठवें दशक में हूं और इस सपने को सच होते देखना चाहता हूं। ये नामुमकिन है ही नहीं। जब आर्मी में सब सही हो सकता है तो फिर राज्य सरकार के लिए क्या मुश्किल है। जब जापान और कोरिया यह सब कर सकते हैं तो फिर हम क्यों नहीं।

जीवन परिचय : दपिंदर सिंह

जन्म तिथि: 10 फरवरी 1930

शिक्षा: देहरादून और लाहौर

कमीशन: 10 दिसंबर 1950

को सेकेंड लेफ्टीनेंट

सेवाकाल: 40 वर्ष

रिटायरमेंट: जीओसी इन सी सदर्न कमांड, तथा ओएफसी आईपीकेएफ श्रीलंका, फील्ड मार्शल मानेक शॉ के चार साल मिलीटरी असिस्टेंट रहे। दो किताबें लिखीं, आईपीकेएफ इन श्रीलंका और सैम मानेक शॉ





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