संपादकीय. अंतत: देश में सार्वजनिक स्थलों को बीड़ी-सिगरेट के धुएं से मुक्त कराने के लिए रोक लगा दी गई है। इसके दायरे में सरकारी और गैर-सरकारी दफ्तरों के अलावा होटल, रेस्तरां, सिनेमाघर एवं बस स्टाप जैसी जगहें आती हैं, जहां धुएं के छल्ले उड़ाने की गुस्ताखी करने पर दो सौ रुपए जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
सड़क, घर, पार्क और निजी वाहनों में सिगरेट-बीड़ी पीने पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं होगी, यह स्पष्ट है। गौरतलब है कि तंबाकू लॉबी ने केंद्र सरकार के इस फैसले पर रोक लगाने के लिए देश के कई उच्च न्यायालयों में याचिका दाखिल की थी, मगर केंद्र सरकार इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट चली गई और वहां जीत सरकार की हुई।
इसी तरह सिगरेट पीने को लेकर अब तक जिस तरह की वैधानिक चेतावनी प्रकाशित होती रही है, उसे और कारगर बनाने के लिए खतरे का निशान प्रकाशित करने का जो मामला था, इसका क्या हुआ, फिलहाल इस पर कोई चर्चा नहीं है। जबकि तंबाकू उत्पाद और शराब की कंपनियों ने विज्ञापन आदि में मुश्किलें पैदा होने के बाद से यह रास्ता निकाला कि अपने प्रसिद्ध ब्रांड नाम से दूसरे उत्पादों की बिक्री करने लगी।
इस चालाकी भरे कदम का मकसद यह था कि लोगों के दिमाग में उस नाम और ब्रांड को लेकर जो छवि बसी होती है, वह धूमिल न होने पाए। इससे उन्हें कितना फायदा पहुंच रहा है, यह अध्ययन का विषय हो सकता है, मगर वे अपने उद्देश्य को सफल बनाने और कानूनी दांव-पेंचों से बचने के लिए कोई न कोई तरीका अख्तियार करती रहती हैं।
देर से ही सही लेकिन सरकार के इस फैसले का फायदा उन तमाम लोगों को पहुंचेगा, जो सिगरेट-बीड़ी नहीं पीते, मगर सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान करने वाले की वजह से धुएं के छल्ले को झेलना पड़ता है।
संवैधानिक नजरिये से भी देखें तो जिस तरह किसी एक नागरिक को सिगरेट पीने की आजादी है, उसी तरह जो इन चीजों के आदी नहीं हैं, उन्हें स्वच्छ और बेहतर माहौल में रहने की आजादी है। किसी नागरिक की आजादी की सीमा वहीं खत्म हो जाती है, जब उसकी आजादी दूसरे नागरिक की आजादी में बाधा उत्पन्न करने लगती है।
मगर नागरिक अधिकारों को लेकर हमारे देश में संवेदनशीलता का जो स्तर है, उसकी वजह से कितने लोग हैं जो दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना चाहते हैं? धूम्रपान पर पाबंदी का जो सरकारी फैसला है, दरअसल वह कानून से ज्यादा सामाजिक संवेदनशीलता का मसला है। देखने की बात यह है कि इस कानून का हमारे समाज पर अच्छा असर पड़ता है या इसका भी हश्र अन्य कानूनों की तरह ही होता है।