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हिंदी के चमकते बाजार में वॉयस ऑफ अमेरिका का सूर्यास्त

53 वर्षो से सक्रिय वॉयस ऑफ अमेरिका की हिंदी सेवा को आखिरकार 30 सितंबर को बंद कर दिया गया। डायचे वेलै (जर्मनी) और रेडियो जापान-जैसे कमतर पहुंच वाले स्टेशन भी अपना हिंदी प्रसारण जारी रखे हुए है, लेकिन वॉयस ऑफ अमेरिका को अब उसकी दरकार नहीं है।

वॉयस ऑफ अमेरिका की हिंदी सेवा के कर्मचारियों पर न खर्च इतना ज्यादा था और न ही उसके श्रोताओं की संख्या अथवा कार्यक्रम की लोकप्रियता इतनी घट गई थी कि पूरी सेवा को बंद करने के अलावा कोई चारा न रह गया हो, लेकिन अमेरिकी सरकार का रोना और है।

उसका कहना है कि शीतयुद्ध समाप्त हो चुका है और सूचना के नए साधन उपलब्ध होने के कारण वॉयस ऑफ अमेरिका की हिंदी सेवा की प्रासंगिकता अब नहीं रह गई है। यह स्वीकारोक्ति शर्मसार करने वाली और यह समझने के लिए काफी है कि वॉयस ऑफ अमेरिका क्यों बीबीसी का मुकाबला नहीं कर पाया?

इस तर्क के आधार पर वॉयस ऑफ अमेरिका को बरसों पहले बंद किया जा सकता था, लेकिन शीतयुद्ध का जमाना गुजरने के बाद भी वॉयस ऑफ अमेरिका का प्रसारण जारी रहा। क्योंकि अमेरिका को भारत का बाजार चाहिए था और उसे रेडियो इसके लिए ठीक जरिया मालूम पड़ता था। बीबीसी और वॉयस ऑफ अमेरिका ने इस स्थिति का लाभ उठाकर लोगों तक वे सूचनाएं पहुंचाईं, जो अन्यथा संभव न थीं और इस तरह उन्होंने भारत में अपना बाजार बनाया।

वॉयस ऑफ अमेरिका अब ईरान, इंडोनेशिया, नाइजीरिया और अफगानिस्तान-जैसे गैर अरब मुस्लिम देशों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है। इस सच्चाई के बावजूद कि मुस्लिम आबादी के लिहाज से भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर है।

भारत पर अब रूस का दबदबा नहीं है। दूसरी तरफ इन गैर अरब देशों में लोगों का दिलो-दिमाग जीतने की नई जंग चल रही है। स्वाभाविक है कि वॉयस ऑफ अमेरिका इसमें अपनी भूमिका देख रहा है। इन देशों में चल रही जद्दोजहद अमेरिकी मानसिकता के लिए नया बाजार है। हिंदी सेवा बंद करके अमेरिका जितना खोएगा, भारतीय प्रिंट मीडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति के ताजा फैसले के बाद कहीं अधिक पा लेगा। इसलिए हिंदी प्रसारण बंद होने से ज्यादा हो-हल्ला नहीं मचा।

भारत के साथ बढ़ते आर्थिक संबंधों, परमाणु समझौते और सशक्त भारतीय-अमेरिकी समुदाय के मद्देनजर अमेरिकी सरकार हिंदी सेवा में नई जान डाल सकती थी, लेकिन उसे बंद किया जा रहा है। जाहिर है कि यह सोच प्राथमिकताओं में फर्क की वजह से आया है। अमेरिका को अभी कई देशों को अपनी हद बताना है, इसलिए उसे गैर-अरब मुस्लिम देशों का बाजार बेहतर लगता है। यहां यह ध्यान रहे कि वॉयस ऑफ अमेरिका की भारत के लिए उर्दू सेवा जारी रहेगी।

हमारे यहां रेडियो दबदबा कायम करने का माध्यम कभी नहीं रहा। बिहार में प्रलयंकारी बाढ़ की विभीषिका के दौरान आकाशवाणी में स्थापित हेल्पलाइन पर अनवरत आते फोन ने साबित किया कि पैठ और विश्वसनीयता के लिहाज से उसका कोई मुकाबला नहीं है। कल्याणकारी राज्य में भाषा केवल लाभ-हानि से जुड़ी नहीं होती।

वॉयस ऑफ अमेरिका के लिए बाजार महत्वपूर्ण है। बाजारोन्मुख अर्थव्यवस्था का ही यह नतीजा है कि अमेरिकी निवेश बैंक लीमैन ब्रदर्स के दिवालिया होने और वॉशिंगटन म्यूचुअल को जेपी मॉर्गन के हाथों बेचे जाने पर हाय-तौबा मच रही है, लेकिन वॉयस ऑफ अमेरिका की हिंदी सेवा का बंद होना दो लाइन से ज्यादा की खबर नहीं बनती।

ऐसे समय में जब बाजार का खुलना अभी जारी ही है और मल्टीनेशनल कंपनियों को पता चलना शुरू हुआ है कि हिंदी में बात किए बगैर अपने उत्पाद बेचना आसान नहीं है, वॉयस ऑफ अमेरिका की हिंदी सेवा का बंद होना खेदजनक नहीं है? दरअसल यह भारत में वॉयस ऑफ अमेरिका की पकड़ मजबूत बनाने का सही वक्त था।

जिस दिन वॉयस ऑफ अमेरिका हिंदी में अपना कारोबार समेट रहा था, ठीक उसी वक्त भारत में इग्नू डॉयचे वेलै की टीवी और रेडियो सेवा के जरिए हिंदी में सात नए प्रकार के कार्यक्रम शुरू करने की घोषणा कर रहा था। पिछले महीने ही यह खबर भी आई कि बीबीसी और डॉयचे वेलै मिलकर यूरोप के लिए अगले वर्ष के शुरू में नई शार्टवेब रेडियो सेवा का प्रारंभ करने जा रहे हैं।

ठीक है कि किसी भी खबर के लिए वॉयस ऑफ अमेरिका से इतर भी पचासों विकल्प हैं, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि वॉयस ऑफ अमेरिका की हिंदी सेवा के जारी रहने से, संयुक्त राष्ट्र में कामकाज की भाषा के रूप में हिंदी को शामिल कराने की मुहिम को बल मिलता। यह बहस भी एक बार फिर शुरू हो सकती है कि अत्याधुनिक संचार सुविधाओं के इस युग में रेडियो कितना कारगर रह गया है?
-लेखक आकाशवाणी में नमित्तिक समाचार वाचक हैं।





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