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सरकारी गाड़ी का सुख 250 रु. में

भोपाल. राज्य सरकार एक तरफ जहां अधिकारियों को लाखों रुपए के वाहन सिर्फ ढाई सौ रुपए में पूरे माह के लिए उपलब्ध करा रही है, वहीं दूसरी ओर शासकीय कर्मचारियों को वाहन भत्ते के रूप में सिर्फ 50 रुपए प्रतिमाह दिए जा रहा हैं। इसके अलावा अधिकारियों की गाड़ियों में लगने वाला डीजल-पेट्रोल सहित मरम्मत और टायर-ट्यूब का खर्च भी राज्य सरकार वहन कर रही है।

राज्य सरकार की सुविधा से अधिकारी वर्ग तो खुश है, लेकिन कर्मचारी वर्ग इस असमानता से दुखी है। अधिकारियों को शासकीय वाहन आवंटित होने पर राज्य सरकार द्वारा मात्र 250 रुपए प्रतिमाह की उनके वेतन से कटौती की जाती है।

अधिकारियों के वाहन का उसके अतिरिक्त परिवार के सदस्यों द्वारा भी कई बार उपयोग करते देखा जाता है। इस आवंटित वाहन में प्रतिमाह 60 लीटर पेट्रोल और यदि वह डीजल वाहन है तो प्रतिमाह 60 लीटर डीजल भी शासन द्वारा ही उपलब्ध कराया जाता है। मुख्यालय से बाहर होने पर अधिकारियों को अतिरिक्र्त ईधन भी दिया जाता है।

एक जनवरी 2000 से परिवहन विभाग के आदेश के तहत एक लाख या इससे अधिक आबादी वाले शहरों में 250 रुपए प्रतिमाह व एक लाख से कम आबादी वाले शहरों या गांवों में पदस्थ अधिकारियों द्वारा वाहन अपने नाम आवंटित कराने पर 150 रुपए प्रतिमाह की दर से कटौती होती है।

सूत्र बताते हैं कि कई विभागों में पदस्थ अधिकारी तो 250 या 150 रुपए जैसी न्यूनतम राशि भी वेतन से न कटे, इसलिए वे वाहन अपने नाम न कराकर संबंधित विभाग के नाम पर आवंटित वाहन का उपयोग अपने कार्र्यो में करते हैं। उधर राज्य शासन से कर्मचारियों को वाहन भत्ते के रूप में सिर्फ 50 रुपए प्रतिमाह मिलते हैं। यह सुविधा भी केवल भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में पदस्थ कर्मचारियों को ही मिलती है। राजधानी में तो कर्मचारियों को दी जाने वाली शासकीय बस की सुविधा भी समाप्त कर दी गई है।

अभी अधिकारियों को आवंटित वाहनों के एवज में उनके वेतन से मात्र 250 रुपए प्रतिमाह काटे जाते हैं। इसे बढ़ाकर 500-1000 रुपए प्रतिमाह करने का विचार किया जा रहा है, ताकि वाहनों का दुरुपयोग कम हो सके।
- राघवजी, वित्त मंत्री





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