Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे.
मनोरंजन उद्योग के भीतर एक विकृत प्रकार का मनोरंजन चलता रहता है और लोग दुश्मन की फिल्म की असफलता पर जश्न मनाते हैं और दोस्त की सफलता से ईष्र्या करते हैं। शायद यह सभी क्षेत्रों में होता है। इस उद्योग में हाशिए पर बैठे कुछ मसखरे असफलता का मखौल उड़ाने वाले संदेश मोबाइल पर अनेक जगह भेजते हैं। मजे की बात यह है कि इन मसखरों ने कभी फिल्म नहीं बनाई। यहां प्रतिक्रियाएं और सफल तथा असफल फिल्मों के परिणाम उनसे नहीं जुड़े लोगों पर भी होते हैं।
मसलन जब कमाल अमरोही की ‘रजिया सुलतान’ असफल हुई तो उस फिल्म से पूरी तरह असंबंधित यश जौहर को दुख इसलिए हो रहा था कि उनकी सफल फिल्म ‘दोस्ताना’ के वितरक ने ही ‘रजिया’ लगाई थी और अब ‘दोस्ताना’ का मुनाफा उन्हें नियमित रूप से नहीं मिलेगा। इस उद्योग में मृत्यु कहीं होती है और जनाजा कहीं और से उठता है।
इस उद्योग में कई बार एक आदमी के असफल प्रयास से दूसरे असफल प्रयास करने वाले को तसल्ली मिलती है और कई बार कार्य कोई करे, प्रमाण-पत्र किसी और को मिलता है। जैसे संजय गड़वी की ‘किडनैप’ उस श्रेणी की फिल्म नहीं है जैसी उनकी ‘धूम’ श्रृंखला’ थी, अत: उनके 19 प्रयास से यह सिद्ध किया जा रहा है कि ‘धूम’ श्रृंखला में निर्माता आदित्य चोपड़ा का बहुत बड़ा योगदान था।
यह अफवाह भी उड़ रही है कि ‘द्रोणा’ की असफलता से राम गोपाल वर्मा को तसल्ली मिली कि उनकी ‘आग’ के समकक्ष या उससे भी बुरा प्रयास हुआ है। एक मसखरे का एसएमएस था कि गोल्डी बहल की फिल्म के नाम से पहला अक्षर ‘डी’ हटा दें। इस ईद पर उतनी सिवइयां नहीं बंटी जितने लतीफे उद्योग में लहराए।
सब बड़ी फिल्मों के प्रदर्शन पर प्रतिक्रियाओं और परिणामों का यही हाल रहता है और फिल्म से जुड़े लोग असफलता के गलत कारणों पर बहस करते हैं और कोई अपनी गलती नहीं मानता। दुख तो इस बात का है कोई असफलता का असली कारण ही नहीं जानना चाहता। सच्चाई का सामना कोई नहीं करना चाहता। सपनों की दुनिया में रहने वाले प्राय: अपनी फिल्म को वर्तमान से आगे की फिल्म मानकर अपनी असफलता को ढांकना चाहते हैं।
युद्ध की फिल्में बनाने वाले ‘विशेषज्ञ’ ने अपनी तीन दर्जन सितारों वाली असफलता का दोष सरकार के माथे पर मढ़ा कि पड़ोसी मुल्कों से मित्रता वार्ता की खातिर उनकी फिल्म को सरकार ने पिटवा दिया। सच्चाई को अनदेखा करना या नकारने का इस उद्योग के पास असीमित माद्दा है। सही घटना से गलत परिणाम पर पहुंचने में भी इन्हें महारत हासिल है। बहरहाल समय और धन गंवाने वाले बेचारे दर्शक का आक्रोश हमेशा अनाभिव्यक्त ही रह जाता है।