दृष्टिकोण.
भारत में आतंकवाद अब अपराध नहीं, राजनीति बनता जा रहा है। जैसा कि राजनीति में होता है, किसी भी मुद्दे पर किस राजनीतिक दल और नेता की प्रतिक्रिया क्या होगी यह पहले से पता रहता है, बिलकुल अब वैसे ही आतंकवाद का हाल हो गया है।
विरोधी दल आतंक की किसी भी घटना के लिए सरकार और सत्तारूढ़ दल को कोसने लगते हैं और सत्तारूढ़ दल अपने रटे-रटाए जुमले दोहरा देता है और वह यह भी देखता है कि कहीं उसका वोट बैंक न गिर जाए। किसी को यह चिंता नहीं सताती कि आतंकवाद को समाप्त कैसे किया जाए? कोई भी उसके कारण और निराकरण की मीमांसा नहीं करना चाहता है।
इसका ताजा उदाहरण जामिया नगर की घटनाएं पेश कर रही हैं। जामिया मिल्लिया के कुलपति ने अपने दो छात्रों के पक्ष में जो शौर्य दिखाया है, एकाएक उसके लिए दिल में तारीफ का जज्बा पैदा होता है। अगर अपने कुल पर कोई भी संकट अचानक आ जाए तो कुलपति का फर्ज क्या होना चाहिए? इस अर्थ में प्रोफेसर मुशीरुल हसन को आतंकवाद का संरक्षक या देशद्रोही कहना उचित नहीं लगता, लेकिन इसी मुद्दे पर भावुकता से थोड़ा ऊपर उठें और दिल की बजाय दिमाग से काम लें, तो हम बिलकुल ही अलग नतीजों पर पहुंचेंगे। मसलन हम यह सवाल खुद से पूछें कि आखिर कुलपति के इस कदम से किसका फायदा होगा? क्या इससे मुसलमानों का फायदा होगा? क्या देश का फायदा होगा? क्या आतंकवादियों का हृदय परिवर्तन होगा? इन तीनों प्रश्नों के उत्तर उल्टे ही आ रहे हैं।
कुलपति के इस कदम ने आतंकवाद और मुसलमानों को एक ही सिक्के के दो पहलू बना दिया है- यह पहली बार हुआ है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि आतंकवाद का आरोप जिन लोगों पर लगा हो या जो पकड़े गए हों, उनके समर्थन में पांच हजार लोगों की सभा हुई हो या जुलूस निकला हो। आम मुसलमान आतंकवाद से उतना ही खफा है जितना अन्य कोई नागरिक, लेकिन जामिया मिल्लिया की सभा का पैगाम क्या है? क्या यह नहीं कि आतंकवाद में लिप्त लोगों के प्रति मुसलमानों के दिल में जो मौन सहानुभूति है उसे जामिया मिल्लिया ने बुलंद किया है? हालांकि उस सभा में वक्ताओं ने आतंकवाद की भत्र्सना की और दोषियों को कड़ी सजा देने की बात भी कही, लेकिन बात जितना बोलती है काम उससे कहीं ज्यादा बोलता है। जामिया ने आतंकवाद का राजनीतिकरण कर दिया है।
जामिया मिल्लिया ने आतंकवाद के दो आरोपियों को कानूनी मदद देने की घोषणा की है क्योंकि वे जामिया के छात्र हैं। उप कुलपति ने उन्हें सस्पेंड कर रखा है। यदि आप उन्हें निर्दोष समझते हैं, तो फिर आपने उन्हें सस्पेंड क्यों किया है? सांच को आंच क्या? यदि उप कुलपति को पूरा भरोसा है कि वे निर्दोष हैं तो उन्हें तुरंत बहाल किया जाना चाहिए और उनके खिलाफ आरोप लगाने वाली पुलिस के खिलाफ देशव्यापी अभियान चलाया जाना चाहिए, लेकिन ऐसी हिम्मत कौन करेगा? इतना नैतिक बल किसमें है? यदि उप कुलपति ऐसा अभियान चलाएं तो सरकार उनका बाल भी बांका नहीं कर सकती, लेकिन जामिया ने जो रास्ता चुना है वह काफी टेढ़ा-मेढ़ा है। वह उन छात्रों को सस्पेंड भी करती है और उन्हें कानूनी मदद भी देना चाहती है।
आरोपी छात्रों को कानूनी मदद देने का आधार क्या है? क्या उनकी कानूनी मदद करने वाला कोई नहीं है? क्या हर विश्वविद्यालय का यह फर्ज है कि अपराध के आरोप में पकड़े गए छात्रों को वह कानूनी मदद दे? यदि हां तो हमारे सारे विश्वविद्यालय गुंडों और अपराधियों के शरणस्थल बन जाएंगे। जो दायित्व आतंकवादी संगठनों का है वह दायित्व हमारे विश्वविद्यालय अपने सिर क्यों लें?
आतंकवाद से अधिक घृणित अपराध आज कौन-सा है? यह ठीक है कि जब तक अपराध सिद्ध न हो जाए, किसी आरोपी को अपराधी नहीं कहा जा सकता, लेकिन आतंकवाद के आरोपियों की हिमायत का अर्थ क्या है? इस दुस्साहसी कदम का प्रेरणास्रोत क्या है? क्या करुणा है, क्या न्याय है? यदि करुणा और न्याय ही मुख्य कारण होते, तो बम विस्फोट में जो बेकसूर मरे हैं, उनके प्रति जामिया का कोई फर्ज बनता है या नहीं? आरोपियों को बचाने के लिए वह लाखों बहाएगी, लेकिन मरने वालों के लिए क्या उसने एक कौड़ी भी दी है? मरने वालों में हिंदू दुकानदार हैं तो निहायत गरीब मुसलमान रिक्शा चालक भी हैं। मरने वाले अनाथ हैं। उन्हें बचाने वाला कोई नहीं है। मारने वालों को बचाने वाले कई हैं। उप कुलपति हैं, मंत्री जी हैं, सत्तारूढ़ दल हैं मजहब उनके काम नहीं आता जो मर गए हैं,मजहब उनके काम आ रहा है जो मार रहे हैं।
यह कितनी बेढब बात है कि दो छात्रों पर सरकार बम-विस्फोट का आरोप लगा रही है और उसका एक मंत्री उन छात्रों की हिमायत को ठीक बता रहा है। यह सरकार है या चूं-चूं का मुरब्बा? यदि आज इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री होतीं तो माननीय मंत्री जी का बिस्तर उनके मुंह खोलते ही गोल हो जाता। जामिया-कांड ने इस सरकार को जितना नुकसान पहुंचाया है, उतना नुकसान कम ही घटनाओं ने पहुंचाया है।
अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने वाली सरकार का स्वर पोंगापंथी, मुल्ला-मौलवियों जैसा हो गया है। ‘सेटेनिक वर्सेस’ पर सरकारी प्रतिबंध की खिल्ली उड़ाने वाले मुशीरुल हसन को भी क्या हो गया है, समझ में नहीं आता। अपराधी, अपराधी है। आतंकवादी, आतंकवादी है, उसकी जात क्या पूछना? उसका मजहब क्या पूछना? जात और मजहब का गणित तो वही बिठाते हैं जो वोट कबाड़ते हैं। जिन्हें देश चलाना है, वे दूध का दूध और पानी का पानी करते हैं।
यह संभव है कि जिन पर आरोप लगे हैं वे छात्र प्रमाणों के अभाव में बरी हो जाएं। उन्हें कानूनी सहायता अवश्य मिलनी चाहिए लेकिन उनका विश्वविद्यालय इस पचड़े में क्यों कूदा, यह रहस्य है। उन छात्रों के रिश्तेदार और मित्र तो हैं ही, उनके अलावा सरकार भी ऐसे लोगों को पूरी कानूनी सहायता देती है।
ऐसे में यदि गुरुजन कूदे हैं तो क्या उनका फर्ज यह भी नहीं है कि वे सत्य और धर्म की रक्षा करें? वे इन छात्रों से अदालत के बिना ही यह मालूम क्यों नहीं करते कि क्या वे सचमुच आतंकवादी हैं? यदि वे अपना जुर्म कुबूल कर लें और उनका हृदय परिवर्तन होता हो, तो उनके क्षमादान के लिए गुरुजन की गुहार को व्यापक समर्थन मिल सकता है। इसके विपरीत अगर अदालत में अपराध सिद्ध हो गया तो गुरुजन ही सोचें कि उनका हश्र क्या होगा?
- लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।