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परमाणु समझौते के बाद

संपादकीय. अमेरिकी प्रतिनिधिसभा से मंजूरी मिलने और सीनेट की सहमति के बाद भारत-अमेरिका परमाणु समझौते की सभी बाधाएं समाप्त हो गई हैं। इस समझौते को लेकर भारत में ही नहीं, बल्कि अमेरिका में भी सीधे-सीधे दो पक्ष दिखाई दे रहे हैं।

भारत में जहां विरोध के स्वर इस ध्वनि के साथ सुनाई दे रहे हैं कि इस करार से भारत अमेरिका के पिछलग्गू देशों में शामिल हो जाएगा और अपनी स्वतंत्र परमाणु नीति पर अमल करने की हालत में नहीं रहेगा, वहीं अमेरिका में इस करार के विरोधियों की दलील यह कहती है कि इस समझौते से दुनिया में परमाणु अप्रसार में बाधा आएगी, क्योंकि भारत हाइड एक्ट की आड़ लेकर परमाणु परीक्षण भी करेगा तो उसे अमेरिकी घरेलू कानून में बांधना मुश्किल होगा। यह एक विचित्र स्थिति है कि जहां एक ओर हमारे यहां समझौते का जिन कारणों से विरोध हो रहा है, वहीं अमेरिका में विरोध के कारण इससे एकदम उलट माने जा रहे हैं।

समझौते के पक्ष और विपक्ष के जो भी तर्क हों इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस बात के लिए सदैव याद किए जाएंगे कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजार से परमाणु ईंधन और तकनीक हासिल करने के लिए पिछले चौंतीस साल से चले आ रहे प्रतिबंध को समाप्त करवाने की दिशा में अपनी सरकार तक को दांव पर लगा दिया था और अंतत: समझौते को अपने अंजाम तक पहुंचाया। इससे पहले फ्रांस से सहयोग का समझौता होना इस देश के लिए इसलिए भी उपलब्धि का कारण है क्योंकि हमारी नाभिकीय ऊर्जा मात्र तीन प्रतिशत ही है।

ऐसे में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और परमाणु ईंधन आपूर्तिकर्ता समूह से हरी झंडी मिलने के बाद ऊर्जा के विश्व बाजार में हमारे प्रवेश का रास्ता साफ हो गया है। अमेरिका और फ्रांस के बाद दिसंबर में रूस से भी इसी तरह का समझौता संभावित है। इसके अलावा भी और बहुत से समझौते अभी होने बाकी हैं।

इस बात पर देश में बहस हो सकती है कि जब संसद में इस करार पर बहस चल रही थी तो सरकार ने यह भरोसा दिलाया था कि भारत के एटमी संयंत्रों के लिए अमेरिका ईंधन की सतत आपूर्ति करेगा, लेकिन करार से संबंधित विधेयक अमेरिकी प्रतिनिधिसभा ने पास किया था तभी यह स्पष्ट हो गया था कि विधेयक में ईंधन आपूर्तिकी जो बात कही गई है वह महज भारत की तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होगी।

सीधा अर्थ है कि भारत को इसकी निर्बाध आपूर्ति की कोई गारंटी नहीं होगी। दूसरी ओर भारत को तकनीक हस्तांतरण को लेकर भी अमेरिका में संशय की स्थिति बनी हुई है। फिर भी इस समझौते को हम एक सजग राष्ट्र के रूप में लेते हैं, तो निश्चित रूप से हम इसका लाभ लेने की ही स्थिति में होंगे।





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