काम के आठ घंटे - खुशी या मजबूरी, बोझ या आनंद? ये मजबूरी और बोझ खुशी में बदल सकते हैं अगर कुछ बातों पर अमल किया जाए। दलाई लामा ने अपनी किताब ‘द आर्ट ऑफ हैपीनेस एट वर्क’ में बताया है, 10 टु 5 मुस्कुराते रहने के राज।
जिंदगी में सबकुछ बहुत अच्छा हो, अगर रोज सुबह ऑफिस न जाना पड़े। मैं अपनी नौकरी से बहुत कुंठित हूं। घटिया नौकरी, बेकार सहकर्मी और गुस्सैल बॉस। चाहूं तो भी नौकरी छोड़ नहीं सकता। ये नौकरी मेरी जिंदगी की खुशी में सबसे बड़ी दीवार है।
ये बातें कितनी जानी-पहचानी-सी लगती हैं। हम सभी कभी न कभी इस तरह से सोचते हैं और नौकरी से मुक्ति पाना चाहते हैं। घर में, बाहर, दोस्तों के साथ, परिवार के साथ तो फिर भी खुश रहा जा सकता है कि लेकिन अपनी नौकरी को आनंद का पर्याय बना लेना थोड़ा मुश्किल है। शायद यही कारण है कि एक ऐसी किताब की जरूरत महसूस हुई, जो अपने काम के घंटों में जीवन को खुशी और उत्साह से भरने के नुस्खे बताए।
अमेरिकन मनोवैज्ञानिक हावर्ड कटलर को इसके लिए सबसे उपयुक्त लगे दलाई लामा। उन्होंने दलाई लामा से इस विषय पर लंबी बातचीत की और उस बातचीत के संकलन से तैयार हुई है यह किताब - ‘द आर्ट ऑफ हैपीनेस एट वर्क’। यह किताब बहुत ठोस और केंद्रित तरीके से अपने प्रोफेशनल काम और कार्यस्थल के साथ खुशी का विस्तार करने के तरीके बताती है।
किताब में बताई गई कुछ महत्वपूर्ण बातें यूं हैं :
अपने व्यवहार का चयन दलाई लामा कहते हैं कि बहुत मुश्किल माहौल में भी हमेशा इस बात की थोड़ी संभावना तो होती ही है कि हम कुछ चीजें चुन सकें। इसमें सबसे बड़ी बात है आपका अपना व्यवहार, जिस पर सिर्फ आपका ही बस है। सहकर्मियों या बॉस के व्यवहार पर आपका नियंत्रण नहीं। लेकिन अपने व्यवहार पर तो है। काम का माहौल चाहे कितना भी कठिन हो, अपनी समस्त आंतरिक शक्तियों से अपने व्यवहार को सहज और संतुलित बनाए रखना चाहिए।
समझना सीखना होगा दलाई लामा कहते हैं कि बहुत बार हमारे दुख का कारण दूसरों का र्दुव्यवहार नहीं होता। हमें जो मिल रहा होता है, वह हमारे ही व्यवहार, हमारी चिढ़ और क्रोध की प्रतिक्रिया होती है। लेकिन अपनी गलतियों की ओर ध्यान देने के बजाय हमने तो अपने मन में बिठा लिया कि दूसरे ही इसके लिए जिम्मेदार हैं। दलाई लामा यह सुझाव देते हैं कि अगर हम हर नकारात्मक विचार को उसकी संपूर्णता में देखना सीख जाएं कि वह कैसे और कहां से उत्पन्न हुआ तो हम ज्यादा समझदार और अपने प्रति ज्यादा न्यायपूर्ण होंगे।
खुद की समझ
बातचीत में दलाई लामा कहते हैं कि हर नकारात्मक विचार को उसकी संपूर्णता में देखते हुए हम एक कदम आगे बढ़कर अपने आप से भी जुड़ते हैं। हमें यह जानना चाहिए कि हम भीतर से वास्तव में क्या हैं, कैसे हैं। जब खुद के बारे में एक सही तस्वीर मन में बनती है, जब हम खुद को ठीक-ठीक जानने लगते हैं तो अपने आसपास की सच्चई को भी ज्यादा स्पष्टता से समझ पाते हैं। यह समझ आपको कार्यस्थल पर लोगों के साथ व्यवहार करने में मदद करती है। बहुत बार क्रोध, ईष्र्या, अड़ियलपन, जिद जैसी चीजें इसीलिए पैदा होती हैं, क्योंकि आप यथार्थ को और खुद को ठीक-ठीक नहीं समझते हैं। खुद की सही समझ लंबी प्रक्रिया में सभी के साथ आपके संबंधों को बेहतर बनाने की दिशा में एक जरूरी कदम है।
शांत मन अर्जित होता है
प्राय: लोग अपने काम और जीवन से असंतुष्ट होते हैं। वे दुखी रहते हैं और इसका असर काम पर भी पड़ता है। तंख्वाह में बढ़ोत्तरी या भौतिक उपलब्धि जरूर कुछ देर के लिए खुश करती है, लेकिन वह खुशी स्थाई नहीं होती। दलाई लामा अपने काम के घंटों को खुशहाल बनाने के लिए मन की स्थिरता को एक जरूरी गुण बताते हैं। वे कहते हैं कि स्थितियां चाहे जैसी भी हों, मन में हमेशा एक शांति का भाव होना चाहिए।
साथ ही वे सभी सहकर्मियों के साथ मानवीय, दयालुतापूर्ण व्यवहार, विवादों व झगड़ों को हवा न देकर उन्हें खत्म करने की बात करते हैं। अपनी सोच, मन और विचारों को बदलकर काम और जीवन, दोनों को खुशहाल बनाया जा सकता है।