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भूख से भूख तक यात्रा

परदे के पीछे.संघर्षरत बेरोजगार युवा से फिल्मकार शशधर मुखर्जी का पहला सवाल होता था कि वह कब से भूखा है और उसे काम की कितनी जरूरत है? शशधर मुखर्जी चयन के मामले में भूख को प्रतिभा से अधिक महत्व देते थे। उन्होंने 1941 से 1970 तक सबसे अधिक सफल फिल्में बनाईं और सबसे अधिक नए लोगों को अवसर दिया।

जब आपके पास काम नहीं होता तो आप मजबूरी के कारण भूखे रहते हैं और जब आप खूब सफल हो जाते हैं तब आप मोटापे के भय से भूखे रहते हैं। कलाकार की यात्रा भूख से भूख तक जाती है और दूसरी दशा वाली भूख में उसके संयम की परीक्षा ज्यादा तकलीफदेह होती है।

आज शाहरुख के पास सब कुछ है परंतु कमर दर्द के लिए किए ऑपरेशन की सफलता एक खास वजन से ऊपर जाने की इजाजत नहीं देती। संघर्ष के समय आप कल्पना करते हैं कि सफल होते ही कोई दु:ख नहीं होगा परंतु सफलता अपने साथ नए नियम लेकर आती है। सफलता असुरक्षित रखैल की तरह होती है और उसकी कई मांगे होती हैं।

भूख का अर्थ देश, काल और परिस्थतियों के साथ बदलता रहता है। पाली हिल पर सफल सितारे के भूखे रहने और बीहड़ों में जनजातियों के भूखे रहने में अंतर है। मंत्री पत्नियों के करवाचौथ के दिन भूखे रहने और बाढ़ग्रस्त लोगों के भूखे रहने में जमीन और आसमान का अंतर है। मधुमेह की वजह से मीठा नहीं खाने और गरीब बच्चे के मिठाई के लिए तरसने में अंतर होता है।

‘आवारा’ फिल्म के एक दृश्य में जेल में मिली रोटी को हवा में उछालकर नायक कहता है कि यह कमबख्त बाहर मिली होती तो मैं जेल के भीतर क्यों आता? महबूब खान की ‘रोटी’ नामक फिल्म में सोने के लिए पागल एक भिखारी जुल्म और अपराध के रास्ते पर चलकर ढेर सारा सोना इकट्ठा करता है।

क्लाईमैक्स में वह सारा सोना ट्रक में डालकर भाग रहा है और एक्सीडेंट होता है। वह चारों तरफ से सोने से दब गया है और केवल एक हाथ बाहर है। घंटों गुजर जाते हैं और वह भूख से परेशान है। सोना खा नहीं सकता। नायक आकर उसके फैले हुए हाथ में रोटी रखता है।

जैसे हर क्षेत्र में नापने के लिए इंच, मील इत्यादि मानदंड बनाए गए हैं, वैसे ही जीवन का पैमाना रोटी भी है। रोटी एक प्रतीक भी है। बोनी कपूर की फिल्म ‘मि. इंडिया’ में दो दिन से भूखे बच्चों के लिए नायिका केक, पेस्ट्री, पिज्जा लाती है। रोटी लाने पर भावना गहरी होती है। पाश्चात्य प्रभाव में ढले फिल्मकार शेखर कपूर केक और रोटी का अंतर नहीं समझते।

बहरहाल शाइनिंग इंडिया में सारे समृद्ध लोग भूखे रहने के लिए बाध्य हैं, क्योंकि मोटापा सौ बीमारियों की जड़ है। उनकी भूख उनके लालच को बढ़ा रही है। धरती भूख मिटा सकती है परंतु विकराल लालच उसके भी बस में नहीं है। दूसरी ओर शाइनिंग इंडिया की छांव में भूख से लोग बेहाल हैं। हमारे सारे विकास और टेक्नोलॉजी के दंभ पर अवाम की यह भूख कालिख ही मल देती है। आज के दौर में भूख से हुई मृत्यु पूरी मानवता के लिए शर्म की बात है। अब भूख, रोटी और प्यास पर फिल्में नहीं बनती, क्योंकि जिनके हाथ में सिनेमातंत्र है, वे लोग स्विट्जरलैंड और शिफॉन ही दिखाना चाहते हैं।





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sandeep shrivastava
Monday, 6th Oct 2008, 11:10
its a bitter truth for india. In this sence our progress is nothing.
naresh
Monday, 6th Oct 2008, 15:28
Dear Sir, This article is really very good... I think chouksey ji is all time best writer of india.
shailendra jain
Monday, 6th Oct 2008, 22:54
आपके विचार अति उत्तम हैं,लैकिन आजकल कौन इसके बारे मै गम्भीरता से सोचता है। इस लेख से शायद लोगों की आँखें खुल जाएँ। धन्यवाद