मुंबई.
अमेरिका से शुरू हुए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट से भारतीय अर्थव्यवस्था को भी झटका लगा है। लेकिन, अर्थशास्त्रियों की मानें तो वित्तीय संकट का यहां उतना असर नहीं पड़ेगा, जितनी आशंका जताई जा रही थी। वे मानते हैं कि देश में इसका असर आने तक घरेलू अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत हो चुकी होगी।
क्या हैं कारण?
चरणबद्ध आर्थिक सुधार
भारत द्वारा आर्थिक सुधारों की तरफ ज्यादा उदारता न दिखाना लाभदायक साबित हो रहा है। यही वजह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर गिरावट के झटके ज्यादा तेज नहीं लगे हैं।
गठजोड़ का असर
दिवालिया हो चुके अंतरराष्ट्रीय निवेश बैंक लीमैन व उसकी सहयोगी इकाइयों को जापानी कंपनी नॉमूरा अधिगृहीत कर रही है। नॉमूरा के भारत की औद्योगिक राजधानी मुंबई में ढाई हजार बैक आफिस व अन्य प्रतिष्ठान चल रहे हैं। इसलिए लीमैन के दिवालिया होने से भारत में उसकी सक्रियता पर फर्क नहीं पड़ेगा। इसी तरह अमेरिकी इंश्योरेंस ग्रुप (एआईजी) यहां टाटा के साथ काम कर रहा है, जो उपभोक्ताओं का विश्वास जीतने में सफल रहा है।
कहां हुआ नुकसान?
विकास दर
पिछले कुछ वर्षों में नौ फीसदी की दर से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था इस बार आठ फीसदी का आंकड़ा भी छू ले तो अचरज की बात होगी।
साफ्टवेयर उद्योग
प्रमुख घरेलू साफ्टवेयर कंपनियों इंफोसिस, विप्रो और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) को वैश्विक संकट में लंबा नुकसान होने की आशंका है। इनका ज्यादातर कारोबार अमेरिकी बैंकों के जरिए होता था, इसलिए अल्पावधि में इनके मुनाफे प्रभावित हो सकते हैं।
शेयर बाजार
विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा अरबों रुपए देश के बाहर निकालने से घरेलू इक्विटी व डेट बाजार कमजोर हुआ है।
निवेशक
निवेशकों को पिछले सप्ताह करीब 10 अरब डालर (469 अरब रुपए) का नुकसान उठाना पड़ा है। उन्होंने यह धन उन कंपनियों में लगाया था, जो अमेरिकी स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं। सर्वाधिक नुकसान आईटी प्रमुख इंफोसिस में धन लगाने वालों को हुआ है, जिसकी बाजारी पूंजी में दो अरब डालर की गिरावट दर्ज की गई है। विप्रो की पूंजी में भी करीब 1.69 अरब डालर की गिरावट आई है। आईसीआईसीआई बैंक व एचडीएफसी बैंक ने मिलकर दो अरब डालर की गिरावट दर्ज की है।
रोजगार
अमेरिकी व ब्रिटिश बैंकों में काम कर रहे है हजारों एनआरआई नौकरियों से हाथ धो चुके हैं। निकट भविष्य में इनकी संख्या में और इजाफा होने की आशंका है। वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार भारतीय कंपनियों में ऐसे लोगों द्वारा भेजे गए आवेदनों का ढेर लग चुका है।
वैश्विक वित्तीय संकट व कमजोर मांग से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय कंपनियों की दिक्कतें बढ़ी हैं।’
-फिक्की
घटा कंपनियों का आत्मविश्वास
वैश्विक वित्तीय संकट के चलते भारतीय कंपनियों के कारोबारी आत्मविश्वास में कमी आई है। फिक्की के सर्वे में शामिल 348 कंपनियों में करीब 48 फीसदी कंपनियों ने अपनी निवेश योजनाएं रद्द कर दी हैं। करीब 56 फीसदी कंपनियां मांग घटने की समस्या से ग्रस्त हैं।
दो लाख करोड़ डालर का राहत पैकेज
दुनियाभर की सरकारों द्वारा वित्त संस्थानों के पुनरुद्धार के लिए घोषित राहत पैकेज का आकार बढ़ कर २ लाख करोड़ डालर (करीब 94 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंचने का अनुमान है। यह राशि भारतीय अर्थव्यवस्था के दोगुने के करीब है।