संपादकीय. संपूर्ण देश में जिस तरह अशांति और आतंक का साम्राज्य पसरता जा रहा है, वह बेहद चिंताजनक है। धार्मिक और जातीय संघर्ष पिछले कुछ वर्षो से पूरे देश में बढ़ता जा रहा है।
इस वजह से न सिर्फ एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत की ‘अनेकता में एकता’ की अवधारणा को भारी क्षति पहुंच रही है, वरन दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में देश की छवि सवालों के घेरे में आ सकती है।
उड़ीसा में कंधमाल में जारी हिंसक आंदोलन पर अभी काबू भी नहीं पाया जा सका है कि इधर असम में दो समुदायों के बीच हिंसक आंदोलन शुरू हो गया है। असम के तीन जिलों में स्थानीय लोगों के बीच जारी हिंसा में अब तक तकरीबन दो दर्जन मासूम लोग मारे जा चुके हैं और दर्जनों लोगों के घायल होने की खबरें आ रही हैं। वहां व्याप्त तनाव और आतंक के मद्देनजर सेना और पुलिस के जवानों की बड़े पैमाने पर तैनाती कर दी गई है और पूरे इलाके में जिस तरह तनाव का माहौल है, उसकी वजह से कफ्यरू लगा दिया गया है।
इस आतंक और जारी हिंसा का यह आलम है कि लोग अपने ठिकानों से बड़े पैमाने पर पलायन कर रहे हैं। प्रभावित इलाकों में प्रशासन की ओर से स्थानीय स्कूलों में जो राहत शिविर लगाए गए हैं, उनमें बड़ी संख्या में लोगों ने शरण ले रखी है। चिंताजनक बात यह है कि वहां हिंसा की घटना पूरी तरह से रुकी नहीं है और लोगों के बीच जिस तरह से खौफ है, उसके लिए किए गए सरकारी प्रयास नाकाफी हैं। दूसरी तरफ असम और महाराष्ट्र के बाद अब मणिपुर में हिंदीभाषियों पर हुए हिंसक हमले में लगभग आधा दर्जन लोगों की हत्या के बाद वहां भी भारी तनाव फैल गया है और सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ है। अब तक मणिपुर के अलगाववादी सुरक्षाबलों पर हमले करते रहे, लेकिन अब उन्होंने आम जनता को निशाना बनाना शुरू कर दिया है।
देश किस तरह चारों ओर से अशांति और आतंक के भंवर में घिरता जा रहा है, यह पिछले कुछ महीनों से जारी कश्मीर के हालात को देखकर भी लगता है। वहां की निरंतर बिगड़ती स्थिति को देखते हुए रविवार से प्रशासन को अनिश्चितकाल के लिए कफ्यरू लगाना पड़ा है। भारतीय प्रशासन से स्वायत्तता की मांग को लेकर कश्मीरी अलगाववादियों ने जिस तरह रैली करने की घोषणा की थी, उसकी वजह से हालात और खराब होते। लगता है, स्थितियों से निपटने का जो हमारा तंत्र है, वह मुस्तैदी से काम नहीं कर रहा है, अन्यथा पूरे देश में आतंक और अशांति का माहौल नहीं बनता।