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Madhya Pradesh
Gwalior Gwalior शिवपुरी. प्रदेश के सड़क परिवहन निगम के कर्मचारियों के सामने यह अहम सवाल खड़ा है कि अगर निगम बंद कर दिया गया तो प्रदेशभर में चल रहे उनके खिलाफ कोर्ट केस कैसे हल होंगे। हालांकि केन्द्रीय श्रम विभाग ने निगम को बंद करने को हरी झंडी नहीं दी है फिर भी प्रदेश का परिवहन विभाग इसे बंद करने पर अड़ा हुआ है। कर्मचारियों का कहना है कि निगम बंद करना पूरी तरह असंवैधानिक है। क्योंकि इस तरह से निगम का अस्तित्व खत्म करना आरटीसी एक्ट 1950 का खुला उल्लंघन है।
प्रदेश सरकार के उपक्रम सड़क परिवहन निगम को बंद करने की घोषणा करीब तीन साल पहले प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री बाबूलाल गौर ने ग्वालियर में की थी। बंद की घोषणा इस आधार पर की गई थी कि सपनि के अस्तित्व में रहते हुए प्रदेश सरकार को घाटा है। लेकिन कर्मचारियों का कहना है कि वास्तव में निगम घाटे में नहीं था बल्कि इसे घाटे में लाने की साजिश रचाई गई थी।
प्रदेश सपनि कर्मचारी संघर्ष समिति के अध्यक्ष श्याम सुंदर शर्मा का कहना है कि यह घाटा 1992 में निगम को दिए जाने डोनेशन का नतीजा है जो तत्कालीन मुख्य मंत्री सुंदरलाल पटवा ने बंद कराया था। इसके साथ ही निगम में घाटे रूपी घुन लग गया था और कर्मचारियों पर बंद की तलवार लटकनी शुरू हो गई थी। जो 12 साल बाद बंद की घोषणा के बाद पूरी तरह कर्मचारियों के गले पर आ गई।
कैसे गठित हुआ था सपनि
कर्मचारी नेताओं का कहना है कि जिस तरह आनन-फानन में प्रदेश सरकार ने सपनि को बंद कर उसके कर्मचारियों को दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर करने की तैयारी कर ली है वह वास्तव में असंवैधानिक है। उनका कहना है कि इस निगम को आरटीसी एक्ट-1950 के तहत 1962 में गठित किया गया था। उस समय यह साफ किया गया था कि जिस तरह निगम का गठन किया जा रहा है उसी तरह इसका विखंडन किया जा सकता है, सीधे-सीधे नहीं। लेकिन इसके विखंडन में किसी भी प्रकार के नियम-कानूनों का पालन नहीं किया गया।
क्या प्रक्रिया है निगम के परिसमापन की
कर्मचारियों के हित के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे श्री शर्मा का कहना है कि निगम को बंद करने से पहले इसका प्रस्ताव निगम के संचालक मंडल में जाना चाहिए था। इसके बाद उक्त प्रस्ताव को विधानसभा में पेश किया जाकर इस पर विचार विमर्श किया जाना था। बाद में इसमें कार्यरत कर्मचारियों की वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए थी तब कहीं जाकर इसके बंद करने संबंधी कदम उठाना था। लेकिन प्रदेश सरकार ने सबसे पहले बंद की घोषणा कर दी बाद में सारी औपचारिकताएं पूरी की हैं।
श्री शर्मा का कहना है कि इसके गठन के समय यह भी तय किया गया था कि निगम के खर्चे में 70 फीसदी हिस्सा राज्य सरकार का और 30 फीसदी हिस्सा केन्द्र सरकार का रहेगा। लेकिन 1992 में राज्य सरकार द्वारा अनुदान खींच लेने के बाद केन्द्र ने भी अपना हिस्सा बंद कर दिया था। जबकि निगम का गठन नो प्रोफिट-नो लास के आधार पर किया गया था।
क्या होगा 11500 लंबित मामलों का
सपनि को बंद करने की जो प्रक्रिया चल रही है उसके तहत हजारों कर्मचारी तो वीआरएस ले चुके हैं जबकि शिवपुरी के 39 कर्मचारी समेत प्रदेश के 1214 कर्मचारी ऐसे भी हैं जिन्हें न तो वीआरएस का लाभ मिला और न ही कहीं उनका संविलियन किए जाने की बात स्पष्ट है। इसके अलावा उक्त निगम कर्मचारियों पर लेनदारी, दुर्घटनाओं, वित्त, वीआरएस, उपभोक्ता विवाद समेत 11500 मामले प्रदेश की विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। अगर मौजूदा हाल में सपनि पूरी तरह बंद हो गया तो यह मामले किसके मत्थे मढ़े जाएंगे।
केन्द्रीय श्रम विभाग ने किया इनकार
हाल ही में राज्य सरकार के प्रतिनिधि केन्द्रीय श्रम मंत्रालय में निगम को बंद कराने की गरज से गए थे। जहां श्रम विभाग की सचिव स्तर की अधिकारी सुधा पिल्लई ने सुनवाई के दौरान इस मामले को कमजोर माना और राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए बंद कराने के साक्ष्यों को पर्याप्त नहीं माना और अपनी ओर से सपनि को बंद कराने को हरी झंडी नहीं दी। इससे प्रदेश सरकार को कोर्ट के मामलों में एक और झटका लगा।