जरदारी साहब की अमेरिका यात्रा को लेकर इस वक्त पाकिस्तान में बहुत किस्से चल रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चित किस्सा है उनकी और सारा पैलिन की मुलाकात को लेकर। जरदारी साहब की सारा की खूबसूरती की तारीफ और फिर उनको गले लगाने की ख्वाहिश तकरीबन तमाम पाकिस्तानी अखबारों में मुख्य खबर बनी है। इस हवाले से कई किस्से भी मशहूर हो गए हैं। एक तो कांस्पिरेसी थ्योरी कहलाता है, जिसमें सारा अमेरिका में चुनाव जीतकर वाइस उप राष्ट्रपति बन जाती हैं, लेकिन कुछ दिनों के बाद जॉन मैक्केन की मौत होते ही वह राष्ट्रपति बन जाती हैं।
जरदारी साहब अब अमेरिकी राष्ट्रपति के पति बन जाते हैं। फिर वह सारा की हत्या करवा देते हैं और कुछ वक्त के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति बन जाते हैं। उनका बेटा बिलावल अपना नाम बदलकर बिलावल पैलिन जरदारी रख लेता है। पाकिस्तानी लोगों ने इस चुटकुले में जरदारी और बेनजीर की जिंदगी के लम्हों को इतनी खूबसूरती से इस्तेमाल किया है कि सुनकर मजा आ जाता है। इस चुटकुले से पाकिस्तानी लोगों की जरदारी साहब के बारे में क्या सोच है, इसका भी पता चलता है। आम जनता जरदारी साहब को बहुत चालाक आदमी समझती है। यह और बात है कि आम अवाम को अब तक इस चालाकी से कोई फायदा नहीं पहुंचा है।
जरदारी साहब ने यूं तो अमेरिका की मदद से अपने दौरे के आखिर में पाकिस्तान के दोस्तों को इकट्ठा कर लिया, लेकिन ये दोस्त किस तरह पाकिस्तान की मदद करेंगे और कितनी मदद करेंगे इसका अंदाजा अभी एक महीने के बाद होगा, जब इनकी दोबारा मुलाकात होगी। यह मदद किन शर्तो पर होगी और क्या यह शर्ते पाकिस्तान को स्वीकार्य होंगी या नहीं, इसका फैसला भी वक्त ही करेगा। जिन मुश्किल हालात का सामना इस वक्त पाकिस्तान कर रहा है, उससे निकलने के लिए शायद वह हर शर्त मानने को तैयार होगा। पाकिस्तानी अखबार इन दिनों इन्हीं मुश्किलों के बारे में जिक्र करते हैं।
हर कोई एक से बढ़कर एक हल पेश करता है, लेकिन उदार सोच रखने वाले स्तंभकारों का खयाल यह है कि पाकिस्तान को हर सूरत में अपनी फौज पर खर्च होने वाले पैसे को कम करना चाहिए। अगर हम यह फैसला कर लें कि हमें अब किसी से जंग नहीं करनी, तो फिर इतनी बड़ी फौज, एफ-16 वगैरह किसी की जरूरत बाकी नहीं रहती। फौज पर खर्च होने वाले पैसे को बचाकर अगर अवाम के कामों में लगाया जाए, तो मुल्क की बहुत बेहतर सूरत बन सकती है। इस सोच को काफी लोग स्वीकार करते हैं, लेकिन यह आम आदमी की सोच नहीं है। आम आदमी अब भी मौलवी लोगों के बहकावे में आकर कट्टर जिहादी सोच रखता है। पेट में रोटी नहीं, तन पर कपड़ा नहीं, लेकिन मौलवी उसे जिहाद का सबक पढ़ा रहे हैं।
फौज और इसका कंट्रोल अब नेताओं के हाथों में होना चाहिए, इस बारे में अलबत्ता कोई दो राय नहीं है। इसी तरह से आईएसआई का कंट्रोल अब अलग तरह से होना चाहिए। अमेरिकी दबाव, पाकिस्तान की राजनीति के दबाव और आर्मी चीफ के अपनी फौज और इसके इदारों पर बेहतर कंट्रोल की ख्वाहिश ने उन्हें फौज में बड़े पैमाने पर बदलाव करने के लिए मजबूर किया है। यूं तो बेशुमार जनरलों को तब्दील कर दिया गया है, इसके साथ ही परवेज मुशर्रफ के दौर के उनके साथियों को भी तब्दील कर दिया गया है। इन तब्दीलियों में सबसे महत्वपूर्ण है लेफ्टिनेंट जनरल नदीम ताज की तब्दीली।
नदीम ताज आईएसआई के प्रमुख और मुशर्रफ के करीबी साथी थे। उन्हें अब गुजरांवाला का कोर कमांडर बना दिया गया है। नदीम ताज एक कठोर जनरल माने जाते थे। आईएसआई में किसी तरह के बदलाव की वे हमेशा मुखालफत करते रहे। बेनजीर के मर्डर की संयुक्त राष्ट्र संघ से जांच कराने के प्रस्ताव की भी उन्होंने मुखालफत की थी। कहा जाता है कि बेनजीर ने दिसंबर के अंत में नदीम ताज को आने वाले चुनावों में धांधली रोकने के लिए साथ देने को कहा था। नदीम ताज ने बेनजीर को सभाओं में जाने से मना किया था, लेकिन वह नहीं मानीं।
नदीम ताज के अलग होने से आईएसआई के अंदर एक नए अध्याय की शुरुआत होगी और शायद इस बार लोकतांत्रिक सरकार आईएसआई को अपनी मर्जी से चलाने में कामयाब हो जाए। लोकतांत्रिक सरकार के लिए सिर्फ यही एक चुनौती नहीं है। अर्थव्यवस्था, पानी, बिजली, महंगाई, आतंकवाद यह सब बड़ी-बड़ी चुनौतियां हैं। इन्हीं में से एक अमेरिका को अपने मुल्क पर हमले से दूर रखना और साथ ही उससे मदद लेना भी शामिल है। लेकिन खुद अपनी मुश्किलों का शिकार अमेरिका, पाकिस्तान की किस हद तक मदद कर पाएगा इसका जवाब आसान नहीं है।
अमेरिका को खुद दूसरे मुल्कों से बड़ी आर्थिक मदद की जरूरत है। ऐसा ही एक सौदा भारत के साथ परमाणु करार के जरिए संभव है। पाकिस्तान भी भारत की तरह इस तरह का समझौता अमेरिका या चीन से करने की तलाश में है। लेकिन एक ऐसा मुल्क जिस पर अब कोई भरोसा नहीं करता, उससे कोई भी मुल्क ऐसा करार क्यों करेगा?
-लेखक लाहौर स्थित जियो टीवी के वरिष्ठ पत्रकार हैं।