bhaskar Web English
HomeVichaar Vichaar

न्यायपालिका की गरिमा का प्रश्न

दृष्टिकोण. justic न्याय तंत्र में भ्रष्टाचार और कदाचार से जुड़े मामलों में उठा हालिया ज्चार वास्तव में राष्ट्रीय शर्म और चिंता का विषय है। देश के मुख्य न्यायाधीश ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हुए हाईकोर्ट के कुछ जजों को हटाने की अनुशंसा की है।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर इस बात को केंद्र में ला दिया है कि ऐसी कोई लागू करने योग्य प्रभावी जवाबदेह प्रणाली होनी चाहिए जो ऐसी स्थितियों से निपट सके। यह प्रकरण इन नियुक्तियों के मौजूदा तौर-तरीकों के संदर्भ में भी आंख खोलने वाला है। कुछ ही लोग इस बात से असहमत होंगे कि किसी तंत्र में एक प्रभावी जवाबदेह प्रणाली के अभाव से इसमें विकार आना लाजिमी है।

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जजों को हटाने की मौजूदा संवैधानिक प्रणाली इतनी बोझिल और गूढ़ है कि वह इसका प्रभावी इलाज नहीं बन सकती। बहु-परतीय होने की वजह से मौजूदा प्रणाली में समय भी बहुत लगता है। इस संदर्भ में पहल तभी की जा सकती है जबकि लोकसभा के 100 सदस्य या 50 राज्यसभा सांसद क्रमश: लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को एक नोटिस दें जिसमें उनके हस्ताक्षर हों। गठबंधन सरकार और बहु-दलीय तंत्र के इस दौर में निश्चित ही इस बाधा से पार पाना आसान नहीं है।

इसके बाद एक सिटिंग सुप्रीम कोर्ट जज, हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद से मिलकर बनी एक समिति के गठन की जरूरत होती है जो आरोपों की जांच कर सके। अपनी तहकीकात में इस कमिटी को संबंधित जज को अपने बचाव का मौका देना होगा।

अगले कदम के तौर पर, यदि कमिटी आरोपी जज को कदाचरण का दोषी पाती है तो संसद में एक प्रस्ताव लाया जाता है। यहां भी संबंधित जज अपना बचाव कर सकता है, एक वकील के जरिए। इसके बाद प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों की सदस्य संख्या के बहुमत से पारित होना चाहिए और यह बहुमत इस दौरान उपस्थित और वोटिंग करने वाले सदस्यों की संख्या के दो तिहाई से कम नहीं होना चाहिए।

आज से तकरीबन दो दशक पूर्व पहली बार ऐसा प्रस्ताव पेश किया गया था। इसने इतिहास रच दिया। इसके अंतिम चरण में जब कमिटी आरोपी के संदर्भ में अपना निर्णय दे चुकी थी, तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया और इसके चलते प्रस्ताव गिर गया। यह वास्तव में अचरजकारी है कि आखिर किस तर्क के आधार पर मतदान से गैरहाजिर रहा जा सकता है और वह भी सत्ताधारी पार्टी द्वारा। राजनीति के लिहाज से यही औचित्यपूर्ण है कि आप प्रस्ताव के पक्ष में या इसके खिलाफ अपना मत पेश करें। हालांकि इसकी प्रक्रिया 1990 में शुरू हुई थी, लेकिन कई वर्षो बाद इस प्रस्ताव पर विचार हुआ। इससे पता चलता है कि इस प्रक्रिया में कितना समय लगता है।

संविधान सभा में जब इस मसले पर बहस चल रही थी, एक सदस्य की राय थी कि विधायिका के जुड़ाव की वजह से किसी जज को हटाना असंभव हो जाएगा। अब तक तो यह आशंका सच साबित हुई है। वास्तव में आज जजों की नियुक्ति और आचरण से जुड़े मसलों पर प्रभावी और तर्कसंगत ढंग से विचार करने की बेहद जरूरत है। देश में जजों की भारी संख्या को देखते हुए उनको हटाने की मौजूदा प्रणाली के साथ विधायिका का जुड़ा होना संभवत: इस समस्या से निपटने का व्यावहारिक तरीका नहीं हो सकता। हालांकि मौजूदा प्रणाली हटाने के अलावा किसी नतीजे पर विचार नहीं करती। निश्चित तौर पर कदाचरण के ऐसे भी कई मामले हो सकते हैं जहां बर्खास्तगी से कुछ कम कार्रवाई की जरूरत हो सकती है।

आजादी के बाद से ही विशेषकर हमारी उच्चतर न्याय व्यवस्था अपनी स्वतंत्रता के लिए पहचानी गई। इसने लोकतंत्र और इसके महत्वपूर्ण संस्थानों को मजबूत करने के लिए काफी योगदान दिया है। मौलिक अधिकारों और मानवाधिकारों के रक्षण में इसका ट्रैक रिकॉर्ड बेहतरीन है। जनहित याचिकाओं के संदर्भ में ज्युडिशियरी द्वारा उठाए गए सकारात्मक और अग्रगामी कदमों को लेकर जनता के मन में व्यापक तौर पर सराहना का भाव है।

हालांकि लोकतंत्र के प्रभावी और सृजनात्मक ढंग से काम करने के लिए यह बहुत जरूरी है कि इसके तीन महत्वपूर्ण स्तंभ- विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका आपसी तालमेल के साथ काम करते हुए यह सुनिश्चित करें कि कोई भी संस्था दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप न करे।

वास्तव में पिछले दो दशकों के दौरान ऐसे कुछ मामले आए जहां न्यायपालिका ने अन्य दो घटकों के क्षेत्र में दखलंदाजी की। अब पिछले डेढ़ दशक से जज ही जज को नियुक्त करते हैं और इसमें कार्यपालिका की कोई प्रभावी भूमिका नहीं होती। बहस का मसला यह है कि क्या इसने बेहतर ढंग से काम किया? क्या अब नियुक्तियों में उच्च गुणवत्ता का सत्व है? परिस्थितियां कुछ और ही इशारा करती हैं जबकि पहले व्यापक तौर पर यह उम्मीद की गई थी कि जजों की नियुक्तियों के मामले में कार्यपालिका की भूमिका को सीमित करने से बेहतर जज नियुक्त होंगे। दुर्भाग्य से यह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी।

कुछ वर्गो का तो यह भी सोचना है कि अब नियुक्तियों में ज्यादा धांधली होती है। यह कहने की जरूरत नहीं कि समाज में पर्याप्त प्रतिभा मौजूद होने के बावजूद इस वर्ग से उतनी नियुक्तियां नहीं होतीं। पहले से ही व्यवस्था में मौजूद लोगों के साथ जुड़ाव मददगार साबित होता है। देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा उठाए गए कदम की कुछ वर्गो ने तारीफ की है। हालांकि इस कदम के मूल में संवैधानिक नतीजे से जुड़े गंभीर मसले हैं।

खास परिस्थितियों में यह न्यायिक स्वायत्तता में दखल की बात करता है। किसी को भी इस बात पर हैरत हो सकती है कि क्या संविधान ने देश के मुख्य न्यायाधीश को यह अधिकार दिया है। क्या होगा यदि प्रधानमंत्री इसे दबाकर बैठ जाते हैं या इसे नजरअंदाज कर देते हैं अथवा गठबंधन के इस दौर में सरकार असहाय हो जाती है। संवैधानिक मामलों के कुछ विशेषज्ञ पत्र के मजमून को लेकर आशंकित हैं। यह एक न्यायिक फरमान है या सुझाव या महज एक सूचना? यह मसला इतना महत्वपूर्ण है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

असल में मौजूदा परिस्थिति कई लिहाज से विस्फोटक है। इस पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। इस दिशा में समय रहते प्रभावी कदम उठाने होंगे। परिष्कृत प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जो न्यायिक स्वायत्तता के साथ समझौता न करे।
-लेखक केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: