संपादकीय. पाकिस्तान के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने दो दिन पहले अमेरिका के एक अखबार को दिए साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि भारत से उनके देश को कोई खतरा नहीं है।
साथ में यह भी जोड़ा था कि जम्मू-कश्मीर में सक्रिय चरमपंथी दरअसल आतंकवादी हैं। उनके बयान को लेकर हो रहे बवाल का सीधा-सा मतलब यह है कि भारत के साथ संबंधों और कश्मीर को लेकर 1947 से अब तक पाकिस्तान की जो नीति रही है, उससे बिल्कुल अलग हटकर सोचने का साहस पहली बार अगर किसी पाकिस्तानी नेता ने दिखाया है, तो वे हैं आसिफ अली जरदारी।
ऐसा पहली बार हुआ है कि पाकिस्तान के किसी शीर्ष नेता ने भारत के बारे में इस तरह का बयान दिया हो और कश्मीर की स्थिति पर ऐसा साहसिक रुख अपनाया हो। आसिफ अली जरदारी चूंकि अब पाकिस्तान के राष्ट्रपति हैं और वहां सत्ता में इस वक्त जिस पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार है, उसकी बागडोर भी उन्हीं के हाथों में है, इस वजह से उनके पूर्व के बयानों की तरह इस बयान को कोई हल्के में लेने की गुस्ताखी नहीं कर सकता।
गौरतलब है कि राष्ट्रपति बनने से पहले जरदारी इस्लामाबाद में अपने आवास पर कुछ महीने पहले हुए संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए देशी-विदेशी पत्रकारों के समक्ष कह चुके हैं कि भारत के साथ वे हर स्तर पर बेहतर रिश्ते के हामी रहे हैं और यहां तक कि दोनों मुल्कों के बीच वीजा-फ्री आवाजाही तक की पेशकश के लिए भी वे तैयार हैं।
भारत के साथ बेहतर संबंधों के बारे में बिल्कुल व्यावहारिक रवैया अपनाते हुए उन्होंने उचित ही कहा है कि पाकिस्तान-जैसे देश आर्थिक तौर पर टिक नहीं सकते, उन्हें पड़ोसी देशों के साथ व्यापार करना ही पड़ता है। जाहिर है, पिछले साठ वर्षो की जो पाकिस्तान की विदेश और व्यापार नीति रही है उससे उलट बयान देने के कारण जरदारी की पाकिस्तान के राजनीतिक दलों और भारतीय कश्मीर के अलगाववादी नेताओं ने तीव्र स्वर में आलोचना की है। वहीं आशा के अनुरूप भारत सरकार ने जरदारी के बयान का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे दोनों देशों के बीच संबंधों को बेहतर बनाने के प्रयासों को बल मिलेगा।
पाकिस्तान एक बड़े सीमा क्षेत्र पर पहले ही युद्ध-जैसी स्थिति का सामना कर रहा है, ऐसे में भारत के साथ भी तनाव मोल लेना उसके लिए आत्मघाती होगा। हालांकि इस बयान के लिए जरदारी और पीपीपी का घेराव वहां के राजनीतिक दल करेंगे और मुमकिन है कि उनकी इस ऐतिहासिक पहल की व्याख्या इस रूप में भी करें कि यह बयान दरअसल अमेरिकी दबाव की उपज है। दबाव की यह राजनीति कश्मीर में शुरू हो चुकी है, जहां पहली बार किसी पाकिस्तानी नेता के पुतले जलाए गए हैं।