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Chhattisgarh
Bilaspur Bilaspur बिलासपुर. आठ वर्षो में आश्चर्यजनक ढंग से 870 लोग गायब हो गए। पिछले दो साल में ही इस आंकड़े में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हुई है। सनसनीखेज बात तो यह है कि लापता लोगों में पुरुषों के बजाय महिलाओं की संख्या ज्यादा है।
जिला अपराध शाखा के बीते आठ वर्षो के रिकार्ड पर नजर डालें तो गुम इंसानों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। पुलिस की बेबसी इस बात से ही झलकती है कि कितने गुम इंसान मिले या लौट आए, इसका महकमे के पास कोई रिकार्ड ही नहीं है।
वर्ष 2001 में जहां गुम इंसानों की संख्या 42 थी, वहीं वर्ष 2007 में यह आंकड़ा 230 तक पहुंच गया। इस तरह पिछले जुलाई तक ही आश्चर्यजनक ढंग से 232 लोग गायब हो चुके हैं। ये लोग कहां गए और किस हालत में हैं?
इसका जवाब किसी के पास नहीं है। घरवाले उनकी तलाश करते थक चुके हैं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। पुलिस के पास भी ऐसा जादुई दर्पण नहीं है, जो गायब लोगों का पता बताए। बीते कुछ सालों में कई लावारिस लाशें मिली हैं, जिनकी शिनाख्त नहीं हो सकी। अधिकांश मामले हत्या या संदिग्ध मौत के हैं। लापता लोगों के परिजन अब थाने, एसपी आफिस और मानवाधिकार आयोग के चक्कर लगा कर थक चुके हैं।
मानव तस्करी के बढ़ रहे मामले भी चिंता का विषय है। जिस तरह महानगरों में छत्तीसगढ़ की युवतियां व किशोरियां मिली हैं, उस लिहाज से पुलिस की भूमिका भी कमजोर कड़ी के रूप में उभरती है।
बनाई गई है टीम
एसपी विवेकानंद सिन्हा के मुताबिक आठ वर्षो से गायब लोगों की सूची बनाई गई है। इसकी छानबीन के लिए सभी थाना प्रभारियों को आदेश दिए गए हैं। राजपत्रित अधिकारियों को भी महीने में दो बार समीक्षा बैठक लेने के निर्देश दिए गए हैं। एक टीम का गठन किया गया है, जो लावारिस लाशों की शिनाख्त उक्त गुम इंसानों के हुलिए से करेगी। गुम इंसान दर्ज होने के बाद भी संबंधित व्यक्ति की तलाश शुरू की जाएगी। इसके अलावा जिला व राज्य पुलिस मुख्यालय, रेलवे के सभी पुलिस अधीक्षकों और जेल अधीक्षकों को भी कार्यवाही हेतु सूची भेजी गई है।
महिलाएं सबसे ज्यादा
गुम होने वालों में महिलाओं व किशोरियों की संख्या सबसे ज्यादा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो आठ वर्षो में 275 पुरुष, 281 महिलाएं, 105 किशोर व 209 किशोरियां लापता हुई हैं।
क्या कहते हैं मनोवैज्ञानिक
मनोवैज्ञानिक डा. पीके तिवारी का कहना है कि किशोरों की सोच में काफी परिवर्तन हुआ है। फिल्मों के हीरो को रोल मॉडल मानकर किशोर व युवा या तो कॅरियर निखारने के लिए निकल जाते हैं या प्रेमी-प्रेमिका घर छोड़कर चल देते हैं। स्त्रियां बहुत जल्दी बहकावे में आती हैं। उन्हें झांसा देकर लोग भगा ले जाते हैं, बाद में यही मामले शारीरिक शोषण या तस्करी के निकलते हैं। अधेड़ उम्र के लोग पारिवारिक जिम्मेदारियों से बचने के लिए घर छोड़ देते हैं। अमूमन मनोवैज्ञानिक व सामाजिक रूप से उक्त कारण ही घर से गायब लोगों के मिलते हैं।
क्या है कानूनी प्रावधान
अधिवक्ता सिद्धार्थ वाजपेयी के मुताबिक भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 108 में 7 वर्षो से लापता लोगों को मृत माना गया है। हालांकि इसके लिए अंतिम फैसला अदालत करती है, जो व्यक्ति इसे चुनौती देता है, उसे लापता व्यक्ति के जीवित होने का प्रमाण पेश करना पड़ेगा।