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Chhattisgarh
Raipur Raipur नई दिल्ली. छत्तीसगढ़ में नक्सली, जनजातीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में परेशानियां खड़ी कर रहे हैं। ये लोगों पर ज्यादतियां करने के साथ उन्हें अपने से जुड़ने के लिए भी विवश कर रहे हैं। यह खुलासा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपी अपनी रिपोर्ट में किया है।
रिपोर्ट में आत्मरक्षा की खातिर हथियार उठाने के लिए सलवा जुड़ूम आंदोलन और छत्तीसगढ़ सरकार को क्लीनचिट दी गई है। डीआईजी सुधीर चक्रवर्ती की अगुवाई में गठित आयोग के तीन सदस्यीय पैनल ने रिपोर्ट में कहा है कि कानून जब अप्रभावी साबित हों तो जनजातियों को आत्मरक्षा का अधिकार देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
झूठे पाए गए आरोप
पैनल ने सलवा जुड़ूम कार्यकर्ताओं की ज्यादती को लेकर मिली 550 शिकायतों में से 168 की जांच की और इन्हें फर्जी पाया। जिन ग्रामीणों को सलवा जुड़ूम कार्यकर्ताओं या सुरक्षा बलों द्वारा मारा बताया गया था, दरअसल वे नक्सलियों की गोली का शिकार बने थे। आयोग ने अहिंसक सलवा जुड़ूम आंदोलन को हिंसक रूप देने के लिए भी नक्सलियों को दोषी माना है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का मानना है कि नक्सली समस्या का संबंध बहुत कुछ सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन से है और राज्य में बेराजगारी बहुत अधिक है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिकाओं में लगे उन आरोपों पर सख्त रुख अपनाया था, जिसमें कहा गया था कि सलवा जुड़ूम कार्यकर्ता हिंसा और ज्यादती में लिप्त हैं।
क्या है सलवा जुडूम
सलवा जुड़ूम आंदोलन नक्सली हिंसा का अहिंसक विरोध करने के लिए शुरू किया गया था। बाद में नक्सलियों की ज्यादतियों के प्रतिकार और आत्मरक्षा के लिए राज्य सरकार ने जनजातीय लोगों को हथियार उपलब्ध कराए।