Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे.
फिल्मकारों को अपनी पुरानी फिल्मों को देखने और दोहराने का शौक होता है क्योंकि यह सफलता की यादों की जुगाली की तरह है। अगर वे आत्मविभोर होने से मुक्त होकर अपना काम देखें तो शायद उन्हें नुक्स नजर आएं।
फिल्म के बनने से पहले, बनते समय और आज इतने वर्षो बाद उन्हें अपने में आए बदलाव पर गौर करने का अवसर मिल सकता है परंतु आत्म निरीक्षण से फिल्मकार बचते हैं और अगर करते भी हैं तो यह ध्यान में रखकर कि अवाम पर इस साफगोई का क्या असर होगा और उनकी छवि में चार चांद लगेंगे या माथे पर लगेगा दाग। इस तरह के कवच को धारण करने पर छवि का आत्म परीक्षण होता है, मनुष्य का नहीं। अपने नितांत गोपनीय क्षणों में स्वयं से किए गए वार्तालाप में भी झूठ शामिल होता है क्योंकि कालांतर में सुरक्षा के लिए धारण किए गए कवच आपकी त्वचा में बदल जाते हैं। इसी सत्य को कबीर ने इस तरह अभिव्यक्त किया-
‘घूंघट के पट खोल तोहे पिया मिलेंगे, कटु वचन मत बोल तोहे पिया मिलेंगे।’
करण जौहर ने एक साक्षात्कार में कहा कि प्रेम और विवाह पर उनका विश्वास घट गया है और अब उनका दृष्टिकोण आदर्श से हटकर सिनिकल हो गया है। उनकी पहली फिल्म ‘कुछ-कुछ होता है’ कॉलेज में प्रेम के बारे में सुनी सुनाई बातों पर आधारित थी, उनका अपना कोई अनुभव नहीं था। ‘कभी खुशी कभी गम,’पिता पुत्र की कहानी थी और इस तरह की भावना देसी थी। अत: यही उनकी एकमात्र ईमानदार फिल्म है। उनकी तीसरी फिल्म ‘कल हो न हो’ के बनते समय उनके पिता को कैंसर हो गया।
फिल्म का नायक भी जानलेवा बीमारी का शिकार था। पिता की मृत्यु के बाद करण जौहर एक वर्ष तक विदेश घूमते रहे और एक मनुष्य तथा फिल्मकार के नाते बेहतर इंसान होने पर विचार करते रहे। उनकी आगामी फिल्म ‘माय नेम इज खान’ उनकी विगत फिल्मों की तरह शादी-ब्याह करवाचौथ फिल्म नहीं होगी। उन्होंने प्रेम और विवाह के टूटने पर ‘कभी अलविदा न कहना’ बनाई क्योंकि उनके जान पहचान के दायरे में उन्होंने प्रेम को भंग होते देखा था।
करण जौहर की साफगोई की प्रशंसा करते हुए यह कहना होगा कि उनकी सभी फिल्मों में कुछ बचकाना बाते हैं और ऐसे समाज का प्रस्तुतीकरण है जो यथार्थ से बहुत दूर है। उनके पात्र भी हाड़मांस के धड़कते हुए इंसान नहीं हैं। उनकी पहली फिल्म ‘कुछ कुछ..’ में एक हिंदू बालिका एक मुस्लिम औरत से एक राज उगलवा लेने के लिए नमाज अदा करने बैठ जाती है। अतार्किक होने के साथ ही आपने उस बच्ची से मासूमियत छीनकर उसे कपटी बना दिया।
बहरहाल करण जौहर से बेहतर फिल्मों की उम्मीद की जा सकती है, क्योंकि वह सोचते हैं। भले ही उसकी सोच उसके जन्म और लालन पालन से कंडीशंड है। फिर भी पंछी पिंजरा तोड़ेगा ऐसी उम्मीद है। वह सैंतीस वर्ष का है और अभी तक कोई प्रेम प्रकरण नहीं हुआ है। उसके पिता ने भी इकतालीस की अवस्था में उस महिला से विवाह किया था जो प्रस्तावित दुल्हन की सहेली थी। उनकी मां हीरू कमाल की महिला हैं और दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में अमिताभ बच्चन की अच्छी मित्र और सहपाठी थीं।