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मुंबइया सिनेमा में दुर्गा

परदे के पीछे. रानी मुखर्जी हर वर्ष दुर्गा पूजन के अवसर पर शूटिंग नहीं करती और मुखर्जी परिवार में शशधर मुखर्जी के जमाने से ही दुर्गा पूजन धूमधाम से मनाया जाता रहा है। पहले पूरा परिवार सांताक्रूज मुंबई में स्थित ग्रोटो विला में रहता था। अब रानी जुहू में पृथ्वी थियेटर्स वाली गली में बने अपने नए बंगले में रहती हैं।

मुंबई के सिनेमा में यश चोपड़ा और धर्मेद्र के बंगलों में पंजाब के पिंड नजर आते हैं। बोनी कपूर और श्रीदेवी के निवास पर तामिलनाडु नजर आता है और आजकल रानी बंगाल की प्रतिनिधि है जबकि दशकों तक यह श्रेय मिथुन चक्रवर्ती की झोली में रहा है।

आप विदेश के कई हिस्सों में भी छोटा भारत या नन्हा जैसलमेर, गुजरात इत्यादि देख सकते हैं। भारतीय कहीं भी जाएं वे अपने साथ अपना अंचल ले जाते हैं। वे कभी रोजी - रोटी देने वाले देश के लोगों से मित्रता नहीं बढ़ाते। पारसी लोगों ने गुजरात के राजा से वहां बसने की आज्ञा लेनी चाही तो राजा ने उनके पास दूध का भरा गिलास इस आशय से भेजा कि अब जगह नहीं है।

पारसी ने दूध के गिलास में शक्कर डालकर वापस भेजा जिसका आशय था कि हम शक्कर की तरह आपके समाज में मिल जाएंगे और सचमुच ऐसा ही हुआ। आज नरेंद्र मोदी के प्रयास से रतन टाटा की नैनो मानो नई शक्कर की तरह आ पहुंची है। कोलकाता ने क्या खोया इसका दो वर्ष बाद अनुमान होगा। विदेश में बसे भारतीय वहां के समाज से अलग-थलग रहकर ताउम्र प्रवासी ही रहते हैं।

यह हमारे विघटन स्वभाव की अंतरराष्ट्रीय अभिव्यक्ति है। गुरुदत्त कर्नाटक के थे परंतु पत्नी गीताराय के कारण बंगाली से लगते थे। उनके यहां भी दुर्गा पूजा होती थी। अपनी शादी के बाद उन्होंने ‘गौरी’ नामक फिल्म शुरू की थी परंतु पति-पत्नी की अनबन के कारण पूरी नहीं हुई। आश्चर्य की बात यह है कि गौरी की कहानी उन्होंने केदार शर्मा की 1941 में बंगाल में बनी फिल्म से उठाई थी।

कथा का सारांश यह है कि मिट्टी के खिलौने और मूर्तियां बनाने वाला नायक मेले में मोटी कमाई करके अपने मित्रों के साथ मुजरा देखने जाता है और एक युवा कोठेवाली से प्रेम विवाह करके कस्बे में लौटता है। नायिका के व्यवहार और कार्य से कस्बा मुग्ध है। वह सभी के कार्य प्रसन्नतापूर्वक करती है। सुखी दाम्पत्य के प्रभाव से पति कड़ा परिश्रम करके खूब धन कमाता है।

सास भी बहू को देवी मानती है। उस शादी का एक गवाह पति को ब्लैकमेल करने में असफल होने पर सारी बात खोल देता है। सत्य जानते ही देवी सी लगने वाली बहू सबको बुरी लगने लगती है। लोग उसके उपकार भी भूल जाते हैं। परिवार को उजड़ता देख नायिका घर छोड़कर चली जाती है। विरह से दु:खी नायक काम में मन नहीं लगा पाता। परिवार आर्थिक चोट खाते ही नायिका की खोज में निकल जाता है। मनुष्य का यह स्वभाव देखिए कि आर्थिक चोट उसके नैतिक मूल्यों को कैसे बदल देती है।

इसी थीम पर राजेंद्रसिंह बेदी ने ‘एक चादर मैली सी’ लिखी जिस पर ऋषि कपूर - हेमा मालिनी अभिनीत फिल्म बनी थी और इसी उपन्यास पर स्वर्गीय गीताबाली (शम्मी कपूर की पत्नी) की फिल्म ‘रानो’ अधूरी रह गई थी।

बहरहाल क्लाईमैक्स में नायक दुर्गा की मूर्ति के विसर्जन के समय सभी मूर्तियों में अपनी पत्नी की झलक देखता है और उसे पाने के प्रयास में डूबकर मर जाता है। आजकल लेखक सलीम खान भी दुर्गा के आधार पर आधुनिक पटकथा लिख रहे हैं। यह सबसे हटकर दुर्गा आधारित फिल्म होगी।





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