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सौरव की टाइमिंग फिर सही

अयाज मेमन की कलम सेसौरव गांगुली हमेशा ही फ्रंट फुट के आकर्षक खिलाड़ी रहे हैं। अब यह देखना होगा कि वीरवार से शुरू हो रही सीरीज में इस 36 वर्षीय खिलाड़ी के थके पैर किस तरह ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों की चुनौती का सामना करते हैं। सौरव में टाइमिंग का अद्भुत बोध रहा है और इस सीरीज के बाद संन्यास लेने का उनका फैसला बताता है कि उन्होंने अभी यह बोध खोया नहीं है। यह थोड़ा अजीब लग सकता है कि टीम में स्थान पाने के लिए भारी बाधाएं पार करने के बाद गांगुली ने पहले टेस्ट की पूर्वसंध्या पर संन्यास का निर्णय लिया।

हर बात में साजिश देखने वाले कह सकते हैं कि यह फैसला सौरव और चयनकर्ताओं के बीच हुए किसी प्रकार के ‘डील’ की पुष्टि है, लेकिन मुझे इस पर संदेह है। मुझे यदि किसी एकमात्र ‘डील’ की संभावना लगती है तो वह यह है कि गांगुली और अन्य वरिष्ठ खिलाड़ियों को बता दिया गया होगा कि वे टीम में तो लिए गए हैं, लेकिन आगे फॉर्म और फिटनेस का ही महत्व होगा।

गांगुली ने गहराई से आत्मनिरीक्षण करने के बाद स्वतंत्र रूप से निर्णय लिया और फिर सही समय पर घोषणा कर सबको चौंका दिया। इतने बरसों के परिचय में मैंने उन्हें आकर्षक व्यक्तित्व का धनी पाया है। शुरुआती सफलता इस सीजन में उन्हें कुछ और मैचों का मौैका दिला सकती थी, लेकिन इससे वे चयनकर्ता और आम क्रिकेट प्रेमी के कठोर विश्लेषण से बच नहीं सकते थे।

इसके विपरीत नाकामी उन्हें चुपचाप बाहर का रास्ता दिखा देती। स्थिति तेजी से प्रतिकूल होती जा रही थी और सौरव ने तय कर लिया कि वे थोथे दंभ का शिकार नहीं बनेंगे। किसी और के बजाय वे खुद फैसला करेंगे। उनका फैसला तेंडुलकर, द्रविड़, कुंबले और लक्ष्मण के लिए अपना भविष्य तय करने का इशारा साबित होता है या नहीं, यह देखने की बात है।

इस बात में कोई संदेह नहीं कि जब सौरव क्रिकेट से विदा लेकर मैदान से बाहर आएंगे तो भारतीय क्रिकेट इतिहास का सबसे आकर्षक युग समाप्त हो जाएगा। कभी संदेह नहीं रहा कि सौरव सर्वश्रेष्ठ कप्तान रहे हैं और इसकी वजह सिर्फ उनके प्रभावशाली नतीजे ही नहीं हैं।

भारतीय टीम के रुख में जो परिवर्तन उन्होंने लाया, वह ज्यादा महत्वपूर्ण है। सौरव ने टीम को तब संभाला जब भारतीय क्रिकेट मैच फिक्ंिसग कांड के कारण कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था। उन्होंने तुरंत ही एक ऐसी टीम निर्मित करने की दृढ़ता व महत्वाकांक्षा दिखाई जो अपने कौशल व रुख को लेकर हर जगह तालियां बटोरने वाली साबित हो।

उन्होंने आत्मगौरव और लक्ष्य हासिल करने की उस भावना का संचार किया, जिसने उस भाग्यवादी हताशा को खत्म कर दिया जो इस देश के खेलों पर हमेशा हावी रही है। इस बात के लिए ही भारतीय क्रिकेट उनका हमेशा ऋणी रहेगा।





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