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एक टेस्ट भगाए गर्भपात का डर

नई दिल्ली. अब मां के खून की एक बूंद बता सकेगी कि गर्भ में पल रहे शिशु को डाउन सिन्ड्रोम का खतरा है या नहीं। इससे उन परीक्षणों की जरूरत भी शायद नहीं होगी, जिनकी वजह से गर्भपात का खतरा हो सकता है। यह दावा न्यूसाइंटिस्ट डॉट कॉम में प्रकाशित एक अध्ययन में किया गया है।

अध्ययन में कहा गया है कि डाउन सिन्ड्रोम से ग्रस्त शिशु को जन्म देना मां के लिए अत्यंत खतरनाक होता है। बच्चे को डाउन सिन्ड्रोम की समस्या है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए अमीनोसेन्टेसिस टेस्ट किया जाता है, जिसे कोरिओनिक वाइलस सैम्पलिंग (सीवीएस) कहते हैं।

इस परीक्षण को लेकर महिलाएं अक्सर संशय में रहती हैं, क्योंकि इससे गर्भपात का खतरा रहता है। एक बूंद खून बता देगा हालात: अनुसंधान कर्ताओं ने गर्भपात के खतरे से बचाव के लिए एक ऐसे ब्लड टेस्ट का प्रयोग किया है, जिससे गर्भपात का खतरा नहीं होता। मां के खून की एक बूंद के परीक्षण से यह पता चल जाता है।

नया परीक्षण शुरू: नए रक्त परीक्षण की विधि 2007 में हांगकांग स्थित चाइनीज यूनिवर्सिटी के डेनिस लो ने विकसित की है। नए रक्त परीक्षण के बारे में लो का कहना है कि यह उत्साहजनक है और समस्या का हल निकलता प्रतीत हो रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो डाउन सिन्ड्रोम से ग्रस्त बच्चे को उसकी मां या पिता से क्रोमोसोम-21 की एक अतिरिक्त प्रति विरासत में मिलती है।

यही प्रति समस्या की जड़ होती है। परीक्षण में उस क्रोमोसोम-21 के विस्तार पर ध्यान केंद्रित किया जाता है जो केवल भ्रूण में ही पता चलता है। इस आरएनए का पता लगाने के बाद अभिभावक की जांच कर देखा जाता है कि यह आरएनए मां से भ्रूण को मिला है या पिता से।

कैसे चलता है डाउन सिन्ड्रोम का पता

जांच के दौरान अगर पता चलता है कि मां और पिता में क्रोमोसोम 21 की मात्रा उतनी ही है जितनी भ्रूण में है तो इसका मतलब है कि शिशु को डाउन सिन्ड्रोम नहीं है। अगर क्रोमोसोम 21 की मात्रा मां या पिता में दोगुनी पाई गई तो शिशु को डाउन सिन्ड्रोम होने की आशंका प्रबल हो जाती है।





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