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अपने काम में ही आनंद खोजें

विकास मंत्र. जब कभी मेरी भेंट ऐसे लोगों से होती है, जो अपना काम खुशी-खुशी कर रहे होते हैं, तो मेरा मन उन्हें सलाम करने लगता है और ऐसे लोगों को देखकर तो उनके पैर छूने का मन करता है, जो अपना काम खुशी-खुशी करते हैं, जबकि वे उस तरह का काम कर रहे होते हैं, जिन्हें हमारा समाज महत्व देने के बजाय थोड़ी नीची नजरों से ही देखता है, मसलन रिक्शा और ऑटो रिक्शा चलाना, ढाबों में बैरे का काम करना, शहर और कालोनियों की सड़कों को बुहारना, दफ्तर में चपरासीगीरी तथा जूठे बर्तनों की धुलाई करना आदि।

मैं जब भी इन्हें देखता हूं, तो समझ नहीं पाता कि आखिर इनके खुश रहने की वजह क्या है। न सम्मान, न धन, न आजादी और न ही किसी से प्यार और प्रशंसा के दो बोल ही। इसके बावजूद ये हैं कि मस्त हैं, किसी से कोई उम्मीद किए बिना और किसी से किसी भी तरह की अपेक्षा किए बिना। यहां तक कि दूसरों की उपेक्षाओं को हर पल झेलते हुए भी ये खुश हैं।

लोग अध्यात्मवाद की बातें करते हैं और इसकी खोज में न जाने कहां-कहां जाते रहते हैं। मैं इसकी खोज करने के लिए कुछ दिनों तक ऐसे ही लोगों की संगत में रहने का विकल्प चुनूंगा, क्योंकि मुझे ऐसे ही लोग सच्चे रूप में एक आध्यात्मिक जीवन जीते हुए जान पड़ते हैं।

जिसे अपने काम में आनंद मिलने लगा, उसने अपने जीवन के मकसद को पा लिया और जिसने अपने जीवन के मकसद को पा लिया, वह आध्यात्मिक हो गया। अध्यात्मवाद बहुत दूर की कोई ऐसी बड़ी और कठिन कौड़ी नहीं है कि जिसके लिए हठयोग साधा जाए या किसी आश्रम की शरण ली जाए। जिसे अपना काम भा गया, वह समझ ले कि उसमें अध्यात्म आ गया।
-लेखक समय एवं जीवन-प्रबंध के विशेषज्ञ हैं।





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