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अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था के खेवनहार

संपादकीय. जो वित्तीय संकट अमेरिका से शुरू हुआ था उसका असर पूरी दुनिया पर दिखाई देने लगा है। इसके कारण शेयर बाजारों में संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है। सोमवार को दुनिया के शेयर बाजारों से अरबों डॉलर का सफाया हो गया।

सबसे पहले एशियाई शेयर बाजार खुले और खुलते ही लुढ़क गए और जब यूरोपीय बाजार खुले, तो उनकी भी शुरुआत बिकवाली से हुई। भारत में भी शेयर बाजार में सोमवार को भारी गिरावट दर्ज हुई और संवेदी सूचकांक 724 अंकों की गिरावट के साथ बंद हुआ। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक की सीआरआर दर घटाने की घोषणा के कारण बाजार में कुछ फर्क आने की उम्मीद बंधी थी, लेकिन उसमें कामयाबी नहीं मिल सकी। इससे भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के गंभीर संकट और उसके विश्वव्यापी प्रभाव का अनुमान लगाया जा सकता है।

बुश प्रशासन ने अपनी डांवाडोल हो रही अर्थव्यवस्था को पार लगाने के लिए जिस 700 अरब डॉलर के विशेष राहत पैकेज की व्यवस्था की है, उसकी बागडोर भारतीय मूल के नील कशकरी को सौंपी गई है। महज पैंतीस साल के नील कशकरी जाने-माने निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स में काम कर चुके हैं और पिछले दो वर्षो से अमेरिकी वित्त मंत्रालय में सहायक सचिव के पद पर काम कर रहे थे।

आर्थिक विशेषज्ञ कशकरी के हाथों में इतनी बड़ी जिम्मेदारी देने पर सवाल भी उठा रहे हैं और वाल स्ट्रीट जर्नल का ये भी कहना है कि पॉलसन अपने चारों तरफ गोल्डमैन सैक्स के लोगों को ही रखना पसंद करते हैं। गौरतलब है कि कशकरी के कंधे पर इससे पहले भी बड़ी जिम्मेदारियां आ चुकी हैं और उसका निर्वहन उन्होंने बखूबी किया भी है।

मगर इस बार उनके कंधे पर जो जिम्मेदारी है उस पर केवल अमेरिका की ही नजर नहीं होगी, बल्कि पूरी दुनिया की नजर होगी, क्योंकि अमेरिका की डांवाडोल आर्थिक नैया को देखकर दुनिया भर के बाजार डूब-उतरा रहे हैं। इस पूरे नाटकीय घटनाक्रम ने अमेरिकी पूंजीवाद को कटघरे में खड़ा कर दिया है, क्योंकि अमेरिका अब तक मानता था कि खुली अर्थव्यवस्था में हम जीतेंगे। लेकिन अब उसे यह समझ में आ जाएगा कि इस खुली अर्थव्यवस्था में दूसरे देश भी जीत सकते हैं।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए 700 अरब डॉलर की राशि तय करने का आधार क्या है? कल को अगर यह पता चला कि खराब असेट्स की कीमत 1400 अरब डॉलर से ऊपर है, तो बाजार का विश्वास और अधिक टूटेगा। भारत में भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था का अनुसरण करने वालों का एक बड़ा तबका है और ऐसा लगता है कि अमेरिका के इस वित्तीय संकट से वह कुछ सीखने को तैयार नहीं है।





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